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अधमरे सिस्टम में क्या जिन्दा और क्या मुर्दा..?

खबर थी कि मृत शिक्षक का तबादला कर दिया गया। यह कोई नयी खबर नहीं है, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, पहले भी हो चुका है और सूरते हाल यही रहे (नयी शिक्षा नीति लागू होने के बावजूद) तो आगे भी होता रहेगा। चार वर्ष तक किसी को पता ही चला कि कौन कब मर गया, वर्षों से जिंदा लोगों की खबर न रखने की आदत पड़ जाय तो ऐसा होना कोई गजब न हुआ।

ऐसा इसलिए हुआ, हो चुका है, होता रहेगा– क्योंकि विभागीय फाइलिंग सिस्टम और डाक्युमेंटेशन (ध्यान रहे कि यहाँ ‘डाक्युमेंटेशन’ में मेन्टेन कम और टेंशन ज्यादा निहित है) के लिए कोई आधुनिक मानक सिस्टम नहीं है बल्कि लगभग ऐसा ही जैसे किसी गाँव के लाला के निजी हिसाब किताब का रजिस्टर।

और ऐसा सिर्फ शिक्षा विभाग में ही नहीं है, लगभग हर सिविल विभाग में है (जंगलात और राजस्व जैसे कुछ विभागों के अपवाद के साथ)।

आपको याद होगा (नहीं याद होगा तो इस बाबत नयी खबर जल्दी ही पढने को मिलेगी, तब शायद याद आ जाए) कि अक्सर जब किसी विभाग में किसी बड़े अधिकारी–नेता की जांच बैठती है तो दो चार महत्वपूर्ण फाइलें गायब मिलती हैं, कहाँ गायब हुई, कोई सुराग नहीं मिलता। यह लाला की दुकान के उस रजिस्टर की तरह ही होता है, जिसे चूहे कुतर जाएँ तो बेटे को कुछ पता नहीं चलता कि बाप ने किससे कितना लेना या देना है।

इसी कारण हर वर्ष सीआर खो जातीं हैं, सेवानिवृत या मृत व्यक्ति का तबादला–प्रमोशन हो जाता है, जिन्दा व्यक्ति लापता हो जाता है।

मेजर जरनल खंडूरी (सेवानिवृत) जब केंद्र में मंत्री थे, तो उन्होंने सभी विभागों के लिए ‘व्हाइट हाल फाइलिंग सिस्टम’ लागू करने की सिफारिश की थी, जिसे तत्कालीन कैबिनेट में मान भी लिया था। इस सिस्टम में फ़ाइल/दस्तावेज खोने की गुंजाइश लगभग न के बराबर होती है, अगर कहीं कोई फ़ाइल खो भी जाए तो पहले तो ये पता तुरंत चल जाता है कि जिम्मेदार कौन है,और दूसरा यह कि खोई फ़ाइल/दस्तावेज की अन्य प्रतियाँ कई जगह मौजूद रहती हैं। फाइलिंग/दस्तावेजीकरण में शामिल हर व्यक्ति (चाहे वह अधिकारी हो या कर्मचारी) का रिकार्ड रहता है, जिसे ट्रेस बेक किया जा सकता है।

किंतु, नौकरशाही (शायद नेताओं का भी) भी एक बड़ा वर्ग ऐसा बदलाव नहीं चाहता था। अतः मेजर जरनल खंडूरी (सेवानिवृत) के जाने बाद यह प्रस्ताव ठन्डे बस्ते में डाल भुला भी दिया गया।

आज यह खबर भी पढ़ी कि शिक्षा मंत्री ने मृत शिक्षक के तबादले के मामले की जांच के आदेश दिए हैं (साथ ही वह पुराना रस्मी बयान भी– दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी)।

यकीन रखिये, यह बैठी हुई जांच, पुरानी जांचों की तरह बैठी ही रहेगी, अपने पैरों पर चल मंजिल तक पहुंचेगी नहीं। क्योंकि जांच भी उन्ही फाइलों/दस्तावेजों के आधार पर होगी, जो लाला के रजिस्टर की तरह हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

लेखक के बारे में-
(लेखक मुकेश प्रसाद बहुगुणा राजकीय इंटर कॉलेज मुंडनेश्वर, पौड़ी गढ़वाल में राजनीति विज्ञान के शिक्षक है और वायु सेना से रिटायर्ड है। मुकेश प्रसाद बहुगुणा समसामयिक विषयों पर सोशल मीडिया में व्यंग व टिप्पणियां लिखते रहते है।)

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