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उत्तराखंड की स्वास्थ्य नीति में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता: तिवारी

जनसुनवाई से होगा स्वास्थ्य सेवाओं का गहराई से विश्लेषण
निजीकरण व व्यवसायीकरण को समाप्त हो, उच्चस्तरीय न्यायिक आयोग का हो गठन

 

अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड जन स्वास्थ्य संघर्ष मोर्चा ने प्रदेश में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। वक्ताओं ने सरकार और विभागीय मंत्री की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।

रविवार को प्रेस वार्ता में वरिष्ठ आंदोलनकारी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं मोर्चा संयोजक पीसी तिवारी ने कहा कि उत्तराखंड में खासतौर पर पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं खत्म हो चुकी है। इलाज से लेकर दवाईयों तक कमीशन का खुला खेल चल रहा है। बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के चलते लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। इन सब के बीच समान नागरिक संहिता पर सरकार अमल कर रही है लेकिन समान स्वास्थ्य व शिक्षा की बात नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य नीति में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। और इसके लिए एक बड़ा जनांदोलन होना चाहिए, जिसमें सभी को आगे आना चाहिए।

तिवारी ने कहा कि वर्ष 2014 में अल्मोड़ा में पहाड़ की चिकित्सा सेवाओं की दुर्दशा को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था। उसके परिणामस्वरूप न केवल हार्ट केयर यूनिट की स्थापना हुई थी, बल्कि मेडिकल कॉलेज के निर्माण को भी गति मिली थी। उस समय विभिन्न दलों और संगठनों ने एकजुट होकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री के समक्ष राज्य की चिकित्सा सेवाओं को सुधारने हेतु कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, लेकिन उन पर गंभीरता से अमल नहीं किया गया।

 

उन्होंने कहा कि मोर्चा ने पूर्व में प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण मांगें उठाई थीं। जिनमें राज्य में चिकित्सा क्षेत्र से संबंधित समस्याओं पर जिलेवार निर्धारित समय में जनसुनवाई, स्वतंत्र न्यायिक आयोग की स्थापना, प्रत्येक विकासखण्ड अथवा क्षेत्र में मॉडल चिकित्सालयों की स्थापना, चिकित्सा जैसे सेवा क्षेत्र में निजीकरण व व्यवसायीकरण को समाप्त करने, चिकित्सा ढांचे में नौकरशाही पदों की बजाय कार्मिक पदों की संख्या बढ़ाई जाने, निर्धारित मानकों के अनुसार चिकित्सक एवं चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने तथा चिकित्सा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और अराजकता पर प्रभावी नियंत्रण किए जाने आदि शामिल थी।

उपपा अध्यक्ष तिवारी ने कहा कि सरकार को प्रदेश की चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री एनआरसी जैसे अन्य कानूनों और मॉडल पर पहल कर सकते हैं, तो उत्तराखण्ड से एक आदर्श स्वास्थ्य नीति बनाकर उस पर कार्य क्यों नहीं किया जा सकता? कहा कि पलायन आयोग ने भी शिक्षा के साथ स्वास्थ्य को उत्तराखण्ड में पलायन का प्रमुख कारण माना था, लेकिन सरकार आज भी गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवाएं देने में असफल है। धौलादेवी ब्लाक में हाल की मौतें पूरी तरह स्वास्थ्य सेवाओं की लापरवाही से जुड़ा मामला हैं, जिनमें विभागीय मंत्री का नैतिक रूप से इस्तीफा या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी।

 

तिवारी ने कहा कि दवा उद्योग, कुछ निजी चिकित्सालयों और राजनीतिक रसूखदारों की मिलीभगत से पूरा स्वास्थ्य तंत्र जकड़ा हुआ है। मेडिकल कॉलेज भी रेफरल सेंटर में बदलते जा रहे हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर सीएचसी और जिला चिकित्सालयों की इमारतें तो खड़ी की जा रही हैं, लेकिन राज्य में पर्याप्त चिकित्सक नहीं हैं। पहाड़ों से मरीजों, खासकर घायलों को हल्द्वानी, बरेली या दिल्ली तक ले जाना ग्रामीणों की नियति बन चुकी है। बड़ी संख्या में प्रसव कराने वाली महिलाएं भी इसी कठिनाई से जूझ रही हैं।

 

वक्ताओं ने कहा ​कि प्रदेश, विशेषकर पहाड़ों में सामान्य चिकित्सा के लिए न तो सरकार की इच्छा शक्ति दिखती है, न ही कोई सुदृढ़ ढांचा। स्वास्थ्य क्षेत्र में हज़ारों युवा अल्प वेतन पर ठेके में कार्य कर रहे हैं, जिससे उनका भविष्य असुरक्षित है, जबकि विभाग के ऊपरी स्तर पर अधिकारियों की भारी भरकम फौज बैठी है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें जनता की सेवा और उपचार के कार्यों में लगाया जाए।

 

वरिष्ठ आंदोलनकारी पीसी तिवारी ने कहा कि चौखुटिया क्षेत्र के ग्रामीणों को अपनी पीड़ा बताने के लिए पैदल देहरादून जाना पड़ रहा है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मोर्चा इस आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन देता है।

प्रेस वार्ता में उपपा की केंद्रीय उपाध्यक्ष आनंदी वर्मा, केंद्रीय महासचिव एडवोकेट नारायण राम, मो. साकिब, मो. वसीम, हीरा देवी, ममता जोशी, ममता बिष्ट, भारती पांडे, भावना पांडे, पुष्कर बिष्ट, जगदीश पांडे, राजू गिरी आदि लोग मौजूद रहे।

 

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