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Uttarakhand:: देरी से बर्फबारी और संकट में काश्तकार, वरदान या अभिशाप?

 

​इंडिया भारत न्यूज डेस्क: हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के लिए बर्फबारी केवल पर्यटन का आकर्षण नहीं, बल्कि यहाँ की अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी की जीवनरेखा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मौसम चक्र में आ रहे अप्रत्याशित बदलाव ने पहाड़ों के काश्तकारों की पेशानी पर बल डाल दिया हैं। वर्ष 2026 की शुरुआत में भी दिसंबर और जनवरी के मध्य तक सूखा रहना और फिर जनवरी के अंत में देरी से हुई बर्फबारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

​बेपटरी होता ‘चिलिंग ऑवर्स’ का गणित

विशेषकर उत्तरकाशी का हर्षिल, चमोली और पिथौरागढ़ पूरी तरह से समय पर होने वाली बर्फबारी पर निर्भर हैं। सेब, खुमानी और अखरोट जैसे फलों को सर्दियों में एक खास तापमान और समय (Chilling Hours) की आवश्यकता होती है।

 

​देरी का असर व फ्लावरिंग पर संकट

दिसंबर में बर्फ न गिरने से पेड़ों की ‘सुप्त अवस्था’ (Dormancy) प्रभावित हुई है।​ जनवरी के अंत में होने वाली बर्फबारी नमी तो देती है, लेकिन यदि इसके तुरंत बाद तापमान बढ़ा, तो पेड़ों में समय से पहले फूल आ सकते हैं, जो बाद में ओलावृष्टि या पाले की भेंट चढ़ जाते हैं।


रबी की फसलों पर ‘सूखी ठंड’ की मार

​पहाड़ों में गेहूं, जौ, और मसूर जैसी रबी फसलें मुख्य रूप से आसमानी बारिश और बर्फ पर टिकी होती हैं। इस बार लंबे समय तक चले सूखे और पाले ने फसलों की ऊंचाई और घनत्व को कम कर दिया है।

उधर, काश्तकार बताते है कि बुवाई के समय नमी न होने से बीज सही ढंग से अंकुरित नहीं हो पाए। अब जो देरी से बर्फ गिरी है, वह फसल को बचाने के लिए काफी तो है, लेकिन जो नुकसान शुरुआत में हो चुका है उसकी भरपाई मुश्किल है।

 

​क्या इस देरी से कोई राहत मिलेगी?

​तमाम चुनौतियों के बावजूद, कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘देर आए दुरुस्त आए’ वाली कहावत यहाँ कुछ हद तक लागू होती है। देरी से हुई बर्फबारी मिट्टी के भीतर छिपे हानिकारक कीड़ों और लार्वा को नष्ट करने में मदद करती है। उत्तराखंड के पारंपरिक जल स्रोत (धारे और नौले) इसी बर्फ के धीरे-धीरे पिघलने से रिचार्ज होते हैं। यह बर्फ गर्मियों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी। साथ ही फरवरी-मार्च में बोई जाने वाली आलू और मटर की फसल के लिए यह ताजा नमी बेहद लाभकारी सिद्ध होगी।

​जलवायु परिवर्तन और भविष्य की राह

​उत्तराखंड में मौसम का यह मिजाज स्पष्ट संकेत है कि ‘क्लाइमेट चेंज’ अब कोई किताबी बात नहीं, बल्कि खेतों तक पहुँच चुका है। किसानों को कम ठंड में भी पकने वाली फसलों की किस्मों की ओर बढ़ना होगा। मिट्टी की नमी को संरक्षित करने के लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग अनिवार्य है। केवल पारंपरिक फसलों के भरोसे न रहकर पॉलीहाउस और ऑफ-सीजन सब्जियों पर ध्यान देना होगा।

​उत्तराखंड में देरी से हुई बर्फबारी काश्तकारों के लिए ‘पूर्ण वरदान’ तो नहीं है, लेकिन यह एक ‘संजीवनी’ जरूर है जो पूरी तरह बर्बाद हो रही फसल को कुछ हद तक सहारा दे सकती है। जरूरत इस बात की है कि सरकार और कृषि विभाग मौसम के इस बदलते पैटर्न को समझते हुए काश्तकारों के लिए नई रणनीति तैयार करें।

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