देहरादून: उत्तराखंड में जमीन से जुड़े विवाद लंबे समय से प्रशासन और पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए है। खासतौर पर मैदानी जिलों में जमीनों के सौदे, फर्जी रजिस्ट्री और कब्जों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए जमीन से जुड़े विवादों में पुलिस की भूमिका को सीमित करने का निर्णय लिया है। स्पष्ट निर्देश है कि बिना लैंड फ्राड कमेटी की संस्तुति के कोई मुकदमा ऐसे मामलों में नहीं किया जाएगा।
दरअसल, पिछले लंबे समय से जमीनों के मामलों पर पुलिस की दखलंदाजी की बात सामने आती रही है। सरकार ने साफ निर्देश दिए हैं कि अब लैंड फ्रॉड के मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी, बल्कि पहले इन मामलों की जांच लैंड फ्रॉड कमेटी करेगी और कमेटी द्वारा जांच और सत्यापन के बाद यदि यह पाया जाता है कि मामला वास्तव में लैंड फ्रॉड का है, तभी पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए जाएंगे।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत भी पहले इस मुद्दे को उठा चुके हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था पर असर पड़ने की एक वजह यह भी है कि पुलिस का काफी समय जमीन विवादों में चला जाता है। त्रिवेंद्र सिंह रावत का मानना था कि जमीन से जुड़े मामलों का समाधान मुख्य रूप से राजस्व और प्रशासनिक तंत्र के जरिए होना चाहिए और पुलिस को ऐसे मामलों से लगभग दूर ही रखा जाना चाहिए।
इस बैठक की अध्यक्षता गढ़वाल कमिश्नर और मुख्यमंत्री के सचिव विनय शंकर पांडे ने की। बैठक में जमीन से जुड़े लंबित मामलों की समीक्षा की गई और कई अहम फैसले लिए गए। समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2021 से जमीन विवाद से जुड़े अनेक मामले अभी तक लंबित हैं, जिनका निस्तारण नहीं हो पाया है।
सरकार का मानना है कि इस नई व्यवस्था से जमीन विवादों के समाधान में पारदर्शिता आएगी और अनावश्यक आपराधिकमुकदमों से भी बचा जा सकेगा। साथ ही पुलिस का ध्यान भी वास्तविक कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की ओर केंद्रित रहेगा।
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