जेकेलोन अस्पताल में अब प्री-मेच्योर नवजात बच्चों को श्वांस में तकलीफ होने पर लेस इनवेजिव सर्फेक्टेंट एडमिनिस्ट्रेशन (लिसा) तकनीक का इस्तेमाल कर फेफड़ों को क्षति होने से बचाया जा सकेगा। अस्पताल में 1500 ग्राम से कम वजनी बच्चों पर इस्तेमाल से अच्छे परिणाम मिले है। प्रीमेच्योर और श्वास संबंधित बीमारी को मेडिकल भाषा में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के नाम से जाना जाता है। जिसकी वजह से इन शिशुओं को जन्म के समय श्वास लेने में तकलीफ होती है।
पहले :
मौजूदा स्थिति में मरीज को वेंटीलेटर पर लेकर श्वास नली में एंडोट्रेकियल ट्यूब से सर्फेक्टेंट डाला जाता है। सुधार के बाद वेंटीलेटर से निकालते है। मरीज को सी-पैप मशीन का सपोर्ट दिया जाता है। जहां एक तरफ श्वास लेने में फायदा मिलता है, वहीं, दूसरी तरफ ट्यूब एवं वेंटीलेटर के साइड इफ़ेक्ट की संभावना है। क्योंकि प्रीमेच्योर नवजात के फेफड़े नाजुक होते हैं।
अब :
नवजात गहन चिकित्सा इकाई के सह प्रभारी डॉ. विष्णु पंसारी के अनुसार साइड इफ़ेक्ट को कम करने के लिए अब अस्पताल में लिसा तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। नवजात को पहले सी-पैप मशीन पर रखते हुए वेंटीलेटर सपोर्ट और ट्यूब के बजाय सर्फेक्टेंट दवा को बारीक़ कैथेटर से डालकर फेफड़ों को विकसित किया जाता है। बाद में कैथेटर को निकाल लेते है। जिससे उसे वेंटीलेटर पर लेने की संभावना कम हो जाती है। तकनीक में रेजिडेंट डॉ.विजय झाझड़िया का भी सहयोग रहा है।
इनका कहना है..
नवजात शिशु गहन यूनिट में लिसा तकनीक को 1500 ग्राम से कम वजनी बच्चों पर इस्तेमाल करने से अच्छे परिणाम मिले है। इससे नवजात बच्चों के फेफड़ों को क्षति होने से बचाया जा सकेगा।- डॉ.अशोक गुप्ता, अधीक्षक, जेके लोन
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