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वीर चंद्र सिंह गढवाली की परंपरा प्रेम की है, नफरत की नहीं

पौड़ी के नगरपालिका अध्यक्ष, पूर्व विधायक और भाजपा नेता यशपाल सिंह रावत बेनाम की बेटी की शादी के कार्ड से इन दिनों ‘संस्कृति के दरोगाओं’ में हा-हाकार मचा है। संस्कृति के ठेकेदारों ने इस शादी को ‘देवभूमि’ को कलंकित करने वाला बताया है। बेनाम की बेटी ने उच्च शिक्षा के दौरान बीटेक के अपने साथी मुस्लिम युवक से प्यार किया। साथ में नौकरी करते हैं। अब शादी करने का फैसला लिया है। युवक अमेठी का रहने वाला है। दोनों परिवारों को इस शादी से कोई एतराज नहीं है। बकायदा उन्होंने कार्ड छापकर इस शादी का सबको निमंत्रण दिया है। बेनाम भी उसी भाजपा के नेता हैं जो सबको नैतिकता, राष्ट्रभक्ति और संस्कारों का प्रमाण पत्र बांटती है। घोर सांप्रदायिक और जनविरोधी विचार के साथ खड़े बेनाम का राजनीति में कभी स्टैंड नहीं रहा। वह पहले कांग्रेस में थे। बिल्कुल उसी तरह के चलताऊ नेता जो तिकड़म से वोट पाकर सत्ता का रास्ता निकाल लेते हैं। लेकिन यह चैंकाने और स्वागतयोग्य है कि उन्होंने बहुत प्रगतिशील नजरिये से अपनी बेटी के प्रेम को देखा और संघ-भाजपाइयों की तरह दोहरा चरित्र रखने के बजाए सबको बताया कि वह अपनी बेटी की शादी मुस्लिम के साथ कर रहे हैं। ‘प्यार के दुश्मनों’ के बीच रहकर इस तरह का साहस दिखाना प्यार करने वालों की जीत है।

इस शादी को लेकर जिस तरह की बयानबाजी या प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वह बताती हैं कि धर्म, क्षेत्र और जाति के नाम पर नफरत फैलाने वालों का एक ऐसा समाज खड़ा हो गया है जो न केवल झूठा और जाहिल है, बल्कि समाज में जहर घोलने वाला भी है। उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ बताकर और ‘हिन्दुत्व’ का चोला ओढ़कर जो कृत्य कुछ नफरती लोग कर रहे हैं, उनसे सावधान रहने की जरूरत है। इनका अपना न कोई धर्म है और न संवेदनाएं। जो मुस्लिमों के साथ शादी और उनके ‘देवभूमि’ में आने को खतरा बता रहे हैं वे यह भूल जाते हैं कि पिछले दिनों जो भी ‘देवभूमि’ को बर्बाद करने वाले कृत्य हुए हैं उसमें एक भी मुस्लिम नहीं है। अंकिता हत्याकांड, दलित युवक जगदीश की हत्या, हेलंग में महिलाओं की घास छीनना, भर्ती घोटाला, विधानसभा में अपनों को नियुक्तियां देना, उत्तराखंड की जमीनों का सौदा करने जैसे कांडों में तथाकथित ‘राष्ट्रभक्त’ और ‘धर्म के ठेकेदार’ शामिल हैं।

ज्यादा पीछे भी न जायें तो ‘देवभूमि’ में दलितों के साथ जो हो रहा है, वह समाज के ठेकेदारों का आइना दिखाता है। जो लोग बेनाम की बेटी की शादी में अपने धर्म और समाज की ‘नाक कटना’ मान रहे हैं वह दलितों के साथ हो रही घटनाओं पर चुप्पी साधते हैं। अल्मोड़ा जनपद के भिकियासैंण में दलित युवक जगदीश की इसलिए हत्या कर दी कि उसने एक सवर्ण लड़की से शादी की। वह भी तब जब लड़की का परिवार लंबे समय से लकड़ी को प्रताड़ित कर रहा था। जगदीश ने उसे सहारा दिया। बागेश्वर में सवर्ण शिक्षक ने एक दलित का सिर इसलिए काट दिया कि उसने सवर्ण की चक्की में हाथ लगा दिया। टिहरी के श्रीकोट गांव में एक दलित की हत्या इसलिए कर दी कि वह एक बारात में सवर्णों के साथ कुर्सी पर बैठ गया था। चंपावत में रमेश नामक युवक की हत्या इसलिए कर दी थी कि उसने सवर्णो की शादी में अपने हाथ से खाना निकाला। चंपावत जिले के सूखीढांग में सवर्ण बच्चों ने दलित भोजनमाता के हाथ से मिड-डे मील खाने से इंकार कर दिया था। यहां तक कि नैनीताल जिले के ओखलकांडा में कोविड के दौरान क्वारंटाइन सेंटर में सवर्ण युवकों ने दलित के हाथ से खाने से मना कर दिया था। इस तरह के जातिवादी अहंकार में डूबा समाज अगर बेनाम की बेटी की शादी से ‘हिन्दुओं’ के अस्तित्व पर होने वाले खतरों से इतना आशंकित है तो उसे पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। हां, अभी जब पौड़ी में इस शादी की चर्चा हो रही थी, तब चंपावत जिले के चौकी गांव में एक कथावाचक गौरव पांडे ने अपनी दलित प्रेमिका की उसी के दुपट्टे से गला घोटकर हत्या कर दी। देहरादून में कुछ साल पहले गुलाटी नाम के युवक ने अपनी पत्नी के किस तरह टुकड़े कर फ्रीजर में डाले थे इसे भी शायद लोग नहीं भूले होंगे।

फिलहाल, इस शादी के बहाने जिस तरह ‘देवभूमि’ में आसन्न खतरों को बताया जा रहा है और उसके पीछे जिस तरह का मनोविज्ञान काम कर रहा है, वह आने वाले दिनों में उत्तराखंड को घोर सांप्रदायिकता में झोंकने का रास्ता तैयार कर रहा है। प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी ने पिछले दिनों जिस तरह के बयान दिये हैं वह बताते हैं कि वह कितने नासमझ और गैरजिम्मेदार हैं। बेशर्मी इतनी कि जिस भाजपा सरकार ने 2018 में पहाड़ को एकमुश्त बेचने का कानून बनाया उसी का मुखिया बजाए उस कानून को रद्द करने के उत्तराखंड में ‘लैंड जेहाद’ का खतरा बता रहा है। जब उसकी सरकार अवैध धार्मिक स्थलों की पहचान करती है तो उसमें अवैध हिन्दू धार्मिक स्थल ज्यादा थे।

खैर, हिन्दू-मुस्लिम के इस एजेंडे के पीछे इनकी जो भी कुटिल राजनीति हो, लेकिन उत्तराखंड में सदियों से हिन्दू-मुस्लिम लोगों के बीच विवाह होते रहे हैं। कुछ तो ऐसे विवाह हैं जो इन कथित संस्कृति के ठेकेदारों को आइना दिखाते हैं। इनमें एक चर्चित जोड़ा है लोकधर्मी मोहन उप्रेती और नईमा खान का। इन दोनों ने उस जमाने में प्रेम विवाह किया जब अल्मोड़ा जैसे पंरपरागत उच्चकुलीन ब्राह्मणों के लिए डूब मरने जैसा कृत्य था। इतिहास गवाह है कि मोहन-नईमा की जोड़ी ने उत्तराखंड की लोक थाती के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। उत्तराखंड के प्रतिनिधि गीत ‘बेडू पाको बारामासा…’, ‘पारे भीड़े की बंसती छोरी…’, ‘सुर-सुरा मरुली बासिगे…’, ‘ओ लाली ओ लाली हौंसिया…’ जैसे गीतों को व्यापक फलक पर लाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उत्तराखंड की लोकगाथाओं ‘राजुला मालूशाही’, ‘अजुआ बफौल’, ‘गोरीधना’ का नाट्य रूपांतरण कर इन दोनों ने लोक विधाओं के लिए ऐतिहासिक योगदान दिया। उन्होंने रामलीलाओं के लिए बहुत काम किया। रामलीलाओं में चौपाइयां गाईं। ‘गौरा’ नाटक में विरह गीत गाये। यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है कि नईमा का परिवार अल्मोड़ा के सभ्रांत मुस्लिम परिवार था। उनके दादा नियाज मुहम्मद म्युनिसिपल बोर्ड में कमिश्नर थे। उनके नाम पर ही अल्मोड़ा के एक मुहल्ले का नाम नियाजगंज है। नईमा के पिता शब्बीर मुहम्मद खान ने एक इसाई महिला से शादी की थी।

मैंने उत्तराखंड के मुसलमानों के इतिहास पर एक विस्तृत लेख पहले लिखा था उसे आप फेसबुक में देख सकते हैं। उसका सार यह है कि ‘देवभूमि’ में मुस्लिमों के बसासत सदियों पुरानी है। उत्तराखंड में इस समय भी अगर शहरों को छोड़ दिया जाये तो लगभग डेढ सौ गांवों में मुसलमान रहते हैं। उनका हमारी संस्कृति, भाषा और लोककलाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहां तक कि वह हमारी सांस्कृतिक प्रतीकों और लोक मान्यताओं को भी आत्मसात कर चुके हैं। इसलिए गढ़वाल में ‘सैद की जागर’ को ‘सैद्ववाली’ के रूप में गाया जाता है। लोक के मर्मज्ञ केशव अनुरागी ने आकाशवाणी से ‘सैद्ववाली’ को अमर बनाया। हमारे लोग भी पीर बाबा को पूजने लगे। यह सांस्कृतिक हस्तांतरण से संभव होता है। आज भी बोली-भाषा, होली, रामलीला, रंगमंच और लोक थातियों को पुष्पित-पल्लवित करने में नैनीताल में हमारे अग्रज सुप्रसिद्ध रंगकर्मी जहूर आलम, पिथौरागढ़ के रहने वाले अभी मुंबई में स्क्रिप्ट राइटर डाॅ. बख्श, लोक के चितेरे लोकधर्मी शमशाद पिथौरागढ़ी, चित्रकार सलीम जैसी बहुत प्रतिभाएं हैं जिन पर ‘देवभूमि’ नाज करती है।

अब एक ऐसी शख्सियत का जिक्र जिसका नाम लेते ही ‘देवभूमि’ में हर कालखंड में उबाल आता रहा है। अपने बच्चों को विदेशों की भूमि में बड़े पदों पर देखने की ख्वाइश करने वाला समाज, अपनों को विदेशी भूमि में प्रधानमंत्री तो छोड़ो किसी शहर का अदना सा पार्षद बनने पर अखबारों के पहले पेज पर नाम आने से उछलने वाले लोग इस महिला का नाम आते ही उबल पड़ते हैं। इस महिला का नाम है- आइरीन पंत। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री की पत्नी। जिन्हें पाकिस्तान में गुल-ए-राणा के नाम से जाना गया। अल्मोड़ा के उच्चकुलीन ब्राह्मण पंतों के खानदान की जिनके दादा तारादत्त पंत ने 1874 में इसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। 1927 में यह लड़की लखनऊ की सड़कों पर साइकिल चलाते हुये कॉलेज जाती थी। अर्थशास्त्र से एमए करने के बाद दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में प्रोफेसर हुई। उसने 1933 में लियाकत अली से शादी की। विभाजन के बाद पाकिस्तान गई। पाकिस्तान की पहली महिला बनीं। लियाकत अली मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक और महिला मामलों की मंत्री बनीं। कराची विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति और सिंध प्रांत की पहली महिला गवर्नर बनी। पाक्स्तिान के लिए तीन देशों की राजदूत रहीं। आइरीन पंत का जिक्र इसलिए कि जब उनके दादा तारादत्त ने इसाई धर्म अपनाया तो अल्मोड़ा के उच्चकुलीन ब्राहम्णों ने उनके लिए ‘घटाश्राद्ध’ की रीति से उन्हें मृत घोषित कर दिया था। उनकी तीसरी पीढ़ी ने इस्लाम कबूल कर लिया। आइरीन को तो पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’ और ‘मादरे पाकिस्तान’ का खिताब भी मिला।

हमारा समाज धर्म और जाति के अंधकार में डूबे रहने के बाद भी कनखियों से धर्म के बंधनों को तोड़कर प्रगति करने वाले लोगों को देखता रहता है। लोकप्रिय लेखिका शिवानी ने आइरीन पंत और अपने परिवार के संबंधों के आलोक में इसे बखूबी बताया है। शिवानी लिखती हैं-
‘हमारे दकियानूसी नाना ने उनकी दुनिया को हमारी दुनिया से अलग करने के लिए हमारे घरों के बीच एक दीवार बनवा दी थी। हमें सख्त हिदायत थी कि हम दूसरी तरफ देखें भी नहीं। उनके घर की रसोई में जाएकेदार गोश्त बनने की पागल कर देने वाली महक हमारी ‘बोरिंग’ ब्राह्मण रसोई में पहुंच कर हमारी अदना सी दाल, आलू की सब्जी और चावल को धराशाई कर देती थी। बर्लिन वॉल के उस पार के बच्चों में हेनरी पंत मेरे खास दोस्त थे। उनकी बहनें ओल्गा और मूरियल (जिसे हम पीठ पीछे मरियल कहते थे) जब अपनी जॉर्जेट की साड़ी में अल्मोड़ा के बाजार में चहलकदमी करती थीं, तो हम लोग रश्क में करीब-करीब मर ही जाते थे।’

खैर, कभी लाहौर, क्वेटा, रावलपिंडी, पेशावर जैसे शहरों में रहकर अपनी सांस्कृतिक-राजनीतिक चेतना को विकसित कर इतिहास के पड़ाव गढ़ने वाले ‘देवभूमि’ के लोग धर्म और जातीयता में इतने बौरा जायेंगे ये तो पेशावर विद्रोह के नायक वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली ने सोचा भी नहीं होगा। उस इतिहास पुरुष ने जिसने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर भारतीय इतिहास में उत्तराखंड के लोगों को स्वाभिमान से खड़ा होना सिखाया। दुनिया को बताया कि धर्म से बड़ी मानवता है, जनता के सरोकार हैं। आजादी के बाद जब सीमान्त गांधी अब्दुल गफ्फार खान भारत आये तो नेहरू ने उनसे कहा- ‘हमें अच्छा लगा कि आप मिलने आये।’ गफ्फार खान ने कहा- ‘मैं आपसे नहीं चन्द्रसिंह गढ़वाली से मिलने आया हूं।’ वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की विरासत प्रेम की है, नफरत की नहीं। इसलिए अपनी विरासत को सही तरीके से समझा भी जाना चाहिए। भाजपा नेता यशपाल बेनाम की बेटी किससे शादी करती है, यह उसका बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है। किसी को भी किसी से प्रेम करने का अधिकार है। हमेशा प्रेम और सौहार्द बांटने वाले उत्तराखंड में नफरत के बीज बोने वालों से सावधान रहने की जरूरत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

लेखक के बारे में-

चारु तिवारी,

(स्वतंत्र पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता)

 

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