-कामयाबी के थे कई रास्ते, लेकिन बीरेश्वर की मंजिल थी सिर्फ भारतीय सेना
-कलेजे का टुकड़ा खोने का असीम दर्द, पर बेटे की शहादत पर परिवार को गर्व
अल्मोड़ा: एक मां-बाप के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को खोने से बड़ा दुख इस दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता। लेकिन जब वह टुकड़ा देश की हिफाजत करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे दें, तो उस असीम दुख के बीच गर्व से छाती चौड़ी हो जाती है। देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा के रहने वाले 25 वर्षीय जांबाज ऑफिसर लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी ने देश सेवा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। 5 असम रेजिमेंट में तैनात इस जांबाज की शहादत पर आज उनके गृह जनपद समेत पूरा देश उन्हें नम आंखों से सलाम कर रहा है।
आर्मी स्कूल, रानीखेत और सैनिक स्कूल घोड़ाखाल से पढ़े बीरेश्वर का एक ही सपना था, सेना की वर्दी। 12वीं के बाद एनडीए और बाद में दो बार सीडीएस में सब कुछ क्लियर करने के बाद भी वह मेडिकल कारणों से बाहर हो गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस दौरान उन्होंने ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से इंग्लिश ऑनर्स में स्नातक किया। और वहां रजत पदक जीता। उनका चयन इंग्लैंड के मशहूर नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी लॉ स्कूल और देश की प्रतिष्ठित क्लैट (CLAT) व एनएलयू (NLU) परीक्षाओं में भी हुआ, पर उन्होंने इन सबको ठुकरा दिया।
जब भी पिता प्रमोद गोस्वामी उनसे किसी दूसरे करियर को चुनने को कहते, तो बीरेश्वर का एक ही जवाब होता था कि उन्होंने भारतीय सेना का राशन खाया है, इसलिए वह सेना में ही जाएंगे। आखिरकार साल 2022 में यूपीएससी सीडीएस के जरिए फाइनल सलेक्शन हुआ। ऑल इंडिया रैंक 11 हासिल कर उन्होंने आईएमए ज्वाइन किया और जून 2024 में पास आउट होकर सेना में टॉप क्लास (आई श्रेणी) के अधिकारी बने।
9 वीं क्लास में की वो फेसबुक पोस्ट, जो आज बन गई भविष्यवाणी
बीरेश्वर के शहीद होने के बाद उनके बड़े भाई ने अपने पिता के सामने एक ऐसा राज खोला जिसे सुन हर कोई दंग रह गया। उनके पिता ने बताया कि जब बीरेश्वर महज 9 वीं कक्षा में पढ़ते थे, तब उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी कि जब मैं 26 साल का हो जाऊंगा, तो तिरंगे में लिपट कर आऊंगा। बचपन का वह शब्द आज सच साबित हो गया और वह अपने 25 वें साल में देश के लिए शहीद हो गए। शहीद होने के बाद सेना के अधिकारियों ने पिता को बताया कि बीरेश्वर एक बेहद जांबाज और बुद्धिमान अधिकारी थे, जो ‘ऑपरेशन शेरावाली’ के तहत घातक कमांडोज की टीम का नेतृत्व कर रहे थे।
“तगड़ा रहो”… पिता के कानों में गूंज रहे हैं यह आखिरी शब्द
रुंधे गले और भीगी आंखों से पिता प्रमोद गोस्वामी अपने लाडले को याद करते हुए भावुक हो उठे। उन्होंने बताया कि बीरेश्वर इसी साल फरवरी में करीब एक माह की छुट्टी पर घर आया था। वह जब भी छुट्टियों में घर आता था, तो आसाम रेजिमेंट के पारंपरिक अंदाज में “तगड़ा रहो..” कहते हुए उन्हें गले से लगा लेता था। बीरेश्वर शहादत के ठीक दो दिन बाद प्रमोट होकर कैप्टन बनने वाले थे। उन्होंने पिता से कहा था कि कैप्टन बनते ही वह आईएमए या एनडीए में बतौर ट्रेनर चुन लिए जाएंगे। 7 जून को यूनिट में उनकी स्टार सेरेमनी के लिए सामान भेजा जाना था, लेकिन उससे पहले ही बेटे की शहादत की खबर आ गई।
सैन्य अफसर के साथ संवेदनशील इंसान भी थे बीरेश्वर
बीरेश्वर सिर्फ एक बेहतरीन सैन्य अफसर ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान भी थे। पिता के मुताबिक, वह हमेशा कहते थे कि फिजूलखर्ची करने के बजाय किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में मदद करो, इससे जो आत्मसंतुष्टि मिलेगी वो कहीं नहीं मिलेगी। पिता प्रमोद गोस्वामी भनोली तहसील में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी और मां सरस्वती गोस्वामी, सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापिका हैं। साथ ही सरकारी सेवा में कार्यरत उनके बड़े भाई और 85 वर्षीय बुजुर्ग दादी भी इस समय गहरे सदमे में हैं। यह एक ऐसी क्षति है जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता। अपने लाडले की शहादत के इस असहनीय दर्द के बीच परिवार का सिर गर्व से ऊंचा है कि उनके बेटे, भाई और पोते ने देश रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।
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