-नहीं मिला 20-22 साल बाद भी एक अदद प्रमोशन
गुणानंद जखमोला
उत्तराखंड में लगभग 2000 पत्रकार हैं, पोर्टल समेत। कुछ मजमा लगाते हैं और कुछ ईमान की बोली लगाते हैं। कुछ सत्ता के आगे दुम हिलाते हैं तो कुछ सब कुछ सहते हुए चुप रह जाते हैं। कुछ जोर से चिल्लाते हैं, लेकिन नक्कारखाने में भला किसकी तूती बोलती है? अधिकांश पत्रकारों की मौज है लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो आज भी स्वाभिमान के साथ भूखे पेट मैदान में डटे हैं।
इन्हीं 2000 पत्रकारों में एक पत्रकार था खुशहाल गोस्वामी। आज सुबह जौलीग्रांट अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। कैंसर से ग्रस्त था। भाग्य का खेल देखिए कि पहले पत्नी को कैंसर हुआ और फिर उसको। आमदनी वही चवन्नी और खर्च 100 रुपया। देश के एक प्रमुख मीडिया ग्रुप में था, लेकिन हालात किसी छोटे से न्यूजपेपर के पत्रकार जैसी। 20 साल में एक भी प्रमोशन नहीं। सब एडिटर का सब एडिटर रहा। उसने अखबार बदला नहीं और प्रबंधन ने उसके हालात को अपने लाभ में बदल दिया। हां, इतना जरूर है कि जीवन के कठिन दौर में उसके साथियों ने उसका साथ नहीं छोड़ा।
खुशहाल गोस्वामी को मैं फरीदाबाद से जानता था। पिछले ढाई दशक की उसकी पत्रकारिता का यदि आंकलन किया जाएं तो बस उसके हिस्से में किराये का मकान, बीमारियां, बेबसी और नाकामियां ही पाता हूं। वह पहले से ही पतला था लेकिन आखिरी पांच-छह महीनों में उसका पेट-पीठ से जा चिपका था। नवम्बर माह में जब मैं उसे देखने करनपुर की एक हवेली में गया था तो पहली मंजिल पर जिस किराये के दो में वह, अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहता था, उसे देख कर दिल में हूक सी उठी कि पहला कमरा तो शुरू होते ही खत्म हो गया था। दोनों बेटे अभी बेरोजगार हैं। बल्कि एक की तो पढ़ाई छूट गयी कि मां को ब्रेस्ट कैंसर हो गया और अब पिता हड्डियों के कैंसर का शिकार हो गया।
बस, यही है 20-22 साल की ईमानदारी से की गयी पत्रकारिता से कमाया धन। कैंसर का पता समय से चल गया था, लेकिन यह तो फैलता ही गया। मैंने सोशल मीडिया पर क्राउड फंडिंग की अपील की तो कुछ पैसा जुटा भी था, लेकिन इंजेक्शन बहुत महंगे थे। उस मीडिया हाउस के पत्रकार साथियों और संपादक ने भी उसकी खासी मदद की। धामी सरकार ने भी मदद की, लेकिन तब तक बात बिगड़ गयी।
खुशहाल ईमानदार था तो स्वाभिमानी होना लाजिमी है। उसने मुझे कहा कि क्राउड फंडिंग के लिए उसके संस्थान का नाम नहीं देना। मैंने नहीं दिया। आज भी मैं अपने उस साथी की इसी बात का मान रख रहा हूं। लेकिन उसकी किस्मत को कोस रहा हूं, कि वाह री किस्मत, ईमानदारी का ये कैसा सिला दिया? किराए का मकान, बेबसी और नाकामियों के बीच ही जीवन गुजार दिया।
अलविदा खुशहाल, विनम्र श्रद्धांजलि।
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