अल्मोड़ा: जिला अस्पताल से लापरवाही की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ओपीडी के समय पर अस्पताल प्रबंधन ने डॉक्टरों की बैठक बुला ली। जिसके चलते दूर-दराज के गांवों से आए मरीज इलाज और रिपोर्ट दिखाने के लिए एक से डेढ़ घंटे तक भटकते रहे।
इमरजेंसी और ओपीडी सभी डॉक्टरों को एक साथ मीटिंग में बुला लिया गया। ओपीडी कक्ष खाली पड़े रहे और दर्द से बेहाल मरीज और उनके तीमारदार डॉक्टरों का इंतजार करते रहे। यही नहीं कई मरीज बिना इलाज कराए ही वापस लौटने को मजबूर हो गए। बाद में कुछ तीमारदार बैठक स्थल यानी पीएमएस कार्यालय में जा धमके। मामला बढ़ता देख अस्पताल प्रबंधन ने आनन-फानन में डॉक्टरों को वापस ओपीडी में भेजा, जिसके बाद मरीजों को राहत मिली।
मरीजों और तीमारदारों का कहना था कि ओपीडी के लिए निर्धारित समय के बाद भी बैठक हो सकती थी। इलाज छोड़कर डॉक्टरों को मीटिंग में बुलाना पूरी तरह गलत है। वही, जिला अस्पताल के पीएमएस डॉ. एस.एस. नबियाल ने मामले में सफाई देते हुए कहा कि बैठक बुलाने से पहले डॉक्टरों से फीडबैक लिया गया था, उन्हें बताया गया था कि बाहर कोई मरीज नहीं बचा हैं, सिर्फ रिपोर्ट वाले मरीज ही हैं। इसके बाद ही उन्होंने बैठक बुलाई थी।
अस्पताल प्रबंधन द्वारा मामले में दिए गए तर्कों पर सवाल यह उठता है कि अगर बैठक के दौरान अस्पताल में मरीज नहीं थे, तो ओपीडी कक्षों के बाहर डॉक्टर्स का इंतजार करने वाले लोग कौन थे? क्या स्वास्थ्य विभाग के लिए प्रशासनिक बैठकें तड़पते मरीजों की जान से ज्यादा जरूरी हैं? सवाल यह भी है कि ऐसी बैठकों का समय ओपीडी के समय के बाद निर्धारित क्यों नहीं किया जाता है?
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