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संस्कृत केवल कर्मकांड की भाषा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार, शीतलाखेत महाविद्यालय में संस्कृत दिवस समारोह का आयोजन

अल्मोड़ा: राजकीय महाविद्यालय, शीतलाखेत में संस्कृत दिवस समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ललन प्रसाद वर्मा ने दीपक प्रज्ज्वलित कर किया।

प्रास्ताविक भाषण में संस्कृत विभाग प्रभारी डॉ. प्रकाश चंद्र जांगी ने कहा कि संस्कृत केवल कर्मकांड की भाषा नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। संस्कृत भाषा विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है। यह सभी भारतीय भाषाओं की जननी है। संस्कृत भारत की एक अत्यंत प्राचीन, शास्त्रीय और वैज्ञानिक भाषा है, जिसका अर्थ संस्कार की गई या शुद्ध की गई भाषा है।

 

उन्होंने कहा कि वर्तमान संदर्भ में संस्कृत भाषा का महत्व केवल धार्मिक या प्राचीनता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विज्ञान, तकनीक, और हमारी सांस्कृतिक पहचान का भी आधार है। संस्कृत का व्याकरण अत्यंत स्पष्ट और व्यवस्थित है। इसकी संरचना कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और कोडिंग के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। आयुर्वेद चिकित्सा, गणित, खगोल शास्त्र, और योग से जुड़े हज़ारों ग्रंथ संस्कृत में ही रचे गए हैं। इन क्षेत्रों के रहस्यों को समझने के लिए आज भी इस भाषा की प्रासंगिकता बनी हुई है। हिंदी समेत कई आधुनिक भारतीय भाषाओं की जड़ें संस्कृत से जुड़ी हैं। इसे सीखने से अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान और उनका व्याकरण समझना आसान हो जाता है, संस्कृत के श्लोक और उच्चारण से स्मरण शक्ति, बौद्धिक क्षमता और तार्किक सोच का विकास होता है।

 

इस मौके पर छात्र छात्राओं के द्वारा विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग किया गया। जिसमें संस्कृत श्लोकोच्चारण, संस्कृत समूह गान, संस्कृत नृत्य, संस्कृत आशुभाषण एवं संस्कृत भाषण प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया।

प्राचार्य प्रो. ललन प्रसाद वर्मा ने कहा कि संस्कृत केवल संवाद या धर्म की नहीं बल्कि गणित, खगोल, चिकित्सा और तकनीकी विज्ञान की भी मुख्य भाषा थी। भारत ने पूरी दुनिया को शून्य और दशमलव प्रणाली दी, जिसके ग्रंथ संस्कृत में रचित हैं। आर्यभट्ट ने आर्यभट्‍टीय ग्रंथ में पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने और पाई (π) का मान 3.14 बताया। भास्कराचार्य ने सदियों पहले गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों की चर्चा की थी। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट्ट का अष्टांग हृदय चिकित्सा विज्ञान के ये ग्रंथ मानव शरीर रचना (Anatomy), शल्य चिकित्सा (Surgery) और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी देते हैं। आज भी आधुनिक चिकित्सक इसके मूल सिद्धांतों को मान्यता देते हैं।

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