इंडिया भारत न्यूज डेस्क: उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’ जैसे अमर शेर लिखने वाले पद्मश्री से सम्मानित मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार 28 मई को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बशीर बद्र पिछले 14 वर्षों से डिमेंशिया से पीड़ित थे। बीमारी के कारण उनकी याददाश्त लगातार कमजोर होती चली गई थी, लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। उन्होंने भोपाल स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली।
वर्ष 1972 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के दौरान लिखी उनकी पंक्तियां- ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’ आज भी लोगों की जुबां पर हैं।
बशीर बद्र अपने पीछे पत्नी और दो बच्चों का परिवार छोड़ गए हैं। उनकी लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं थी। दुनिया के कई देशों में उनके चाहने वाले मौजूद थे और उन्हें मुशायरों व साहित्यिक आयोजनों में विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था।
डॉ. बद्र की शायरी में मोहब्बत का ख़ुलूस, ज़िंदगी की तल्ख़ी, शहरी भाग-दौड़ की बेचैनी और हिंदुस्तानी मिट्टी की ख़ुशबू मिलती है। उनके शेर सड़क से लेकर संसद तक गूंजते रहे हैं। उनकी ग़ज़लों ने देश-दुनिया में लोगों के दिलों को छुआ और ज़ुबानों पर चस्पा हो गए।
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