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हंस फाउंडेशन से जुड़ें लोगों ने सीखीं चारा विकास की आधुनिक तकनीकें, पशुपालन और वन संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा

पंतनगर: हंस फाउंडेशन द्वारा प्रदेशभर में संचालित परियोजनाओं से जुड़ें प्रतिभागियों ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर में आयोजित Fodder Development and Conservation Techniques विषय पर आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रतिभाग किया।

 

दो एवं तीन सितंबर को आयोजित प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को चारा फसलों की उन्नत किस्मों, वर्षभर चारा उत्पादन, चारा संरक्षण, साइलेंज निर्माण एवं प्रबंधन तथा पशुओं को संरक्षित चारा उपलब्ध कराने की आधुनिक तकनीकों की जानकारी विशेषज्ञों द्वारा दी गई।

 

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संबंधित संस्थान में व्यावहारिक भ्रमण भी कराया गया। इस दौरान विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को साइलेंज, इसे बनाने की विधि, साइलेंज तैयार करने की प्रक्रिया, उसके संरक्षण और पशुओं के लिए इसके उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। प्रतिभागियों को चारा संरक्षण की विभिन्न व्यावहारिक तकनीकों से भी अवगत कराया गया।

 

हंस फाउंडेशन के सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर पुरुषोत्तम थपलियाल ने हंस फाउंडेशन द्वारा संचालित वन अग्नि शमन एवं रोकथाम परियोजना के संदर्भ में चारा विकास के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन के कारण पशुपालन में कमी आ रही है। ऐसे में गांवों में पर्याप्त एवं पौष्टिक चारे की उपलब्धता सुनिश्चित कर पशुपालन को पुनः बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे ग्रामीण आजीविका भी मजबूत होगी।

 

थपलियाल ने कहा कि वनाग्नि की दृष्टि से भी चारा विकास महत्वपूर्ण है। गांवों में चारा उत्पादन एवं संरक्षण को बढ़ावा मिलने से पशुपालकों को स्थानीय स्तर पर चारा उपलब्ध होगा और जंगलों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। इससे वन क्षेत्रों पर दबाव कम होने के साथ वन संरक्षण एवं वनाग्नि की रोकथाम के प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।

 

सभी प्रतिभागियों से प्रशिक्षण से प्राप्त तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान को अपने कार्यक्षेत्र में किसानों एवं पशुपालकों तक पहुंचाने का आह्वान किया। जिससे चारा उत्पादन, पशुपालन एवं ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के साथ वन संरक्षण में भी समुदाय की भागीदारी बढ़ाई जा सके।

प्रशिक्षण में अल्मोड़ा के अलावा बागेश्वर, पौड़ी गढ़वाल एवं टिहरी जनपदों से हंस फाउंडेशन के कर्मचारियों और परियोजना से जुड़े लोगों ने प्रतिभाग किया।

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