-ऊर्जा, कृषि और खाद्य संकट पर दिल्ली में मंथन, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
-वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत के हितों की रक्षा के लिए उठी आवाज
नई दिल्ली: रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान के तहत राजेन्द्र भवन, नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों से आए राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य भारत की विदेश एवं व्यापार नीति, ऊर्जा, कृषि और गहराते खाद्य संकट जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा करना था। इस दौरान सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि इन जन-मुद्दों को धार देने के लिए जल्द ही एक राष्ट्रीय मोर्चे का गठन किया जाएगा।
इस सम्मेलन में आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, राष्ट्रीय किसान मंच, राष्ट्र उदय पार्टी, राज्याधिकार पार्टी, इंडियन प्रजा कांग्रेस, नवनिर्माण कृषक संगठन, भारतीय मानव समाज पार्टी, कर्नाटक जनशक्ति, संपूर्ण भारत क्रांति पार्टी आदि संगठनों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (AIPF) के नेता व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने देश की वर्तमान स्थिति को गंभीर बताते हुए सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश इस समय एक गंभीर दौर से गुजर रहा है। मौजूदा सरकार लोकतंत्र को कुचलने का काम रही है। हालात यह है कि किसान, नौजवान, मजदूर, महिलाओं के अधिकारों पर आवाज उठाने वालों पर दमनात्मक कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान के तहत रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन, भूमिहीनों को आवासीय जमीन के अधिकार और अतिपिछड़ों के प्रतिनिधित्व की मांग के साथ देश से पूंजी के आवागमन पर नियमन और नियंत्रण पर अभियान चलाया जा रहा है। जिससे लोगों की लोकतांत्रिक चेतना जागृत हो रही है।
एआईपीएफ नेता सिंह ने कहा कि इस सम्मेलन के माध्यम से सरकार की कुनीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने हेतु देश के अलग अलग राज्यों में जनमुद्दों के लिए लड़ रहे राजनीतिक सामाजिक ताकतों को एकमंच पर लाने और एक बड़ा राजनीतिक मोर्चा तैयार करने की पहल शुरू की गई है। उन्होंने कहा कि देशभर में जब राजनीतिक सामाजिक संतुलन बदलेगा, तो मौजूदा सरकार का हमलावर रूख और झूठ बेनकाब होगा और सच जनता के सामने आएगा।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार देश की संपत्तियां चुनिंदा पूंजीपतियों को सौंप रही है, जिससे एकाधिकार बढ़ रहा है और जनता पर महंगाई का बोझ डाला जा रहा है। उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं को पूरी तरह मुफ्त करने की वकालत की।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरूण कुमार ने वैश्विक अस्थिरता और नव-औपनिवेशिक संकट पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अंतराराष्ट्रीय मंचो से लगातार देश को अपमानित करने वाले वक्तव्य दिए जा रहे है लेकिन मोदी सरकार इसका कोई जवाब नहीं दे पा रही है। जिससे देश की गरिमा व प्रतिष्ठा को गहरा नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि भारत पर विदेशी दबाव का मुख्य कारण तकनीकी आत्मनिर्भरता की कमी है। उन्होंने शिक्षा पद्धति को मजबूत करने और तकनीकी विकास पर जोर दिया ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की गरिमा सुरक्षित रहे।
अर्थशास्त्री जया मेहता ने रेखांकित किया कि मध्य-पूर्व के युद्धों के कारण भारत में ऊर्जा और उर्वरक का संकट पैदा हो रहा है, जिसका सीधा असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पी.सी तिवारी ने राज्य की वर्तमान परिस्थितियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद आज जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधन पूंजीपतियों के हाथों में हैं और हिमालयी क्षेत्र में अवैज्ञानिक तरीके से विध्वंसक विकास किया जा रहा है, जो पूरे देश के लिए खतरे की घंटी है। बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए हुए उन्होंने ठेका प्रथा की आलोचना की और कहा कि मजदूरों को कड़ी मेहनत के बाद भी वेतन के लिए भटकना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन पार्टी राजनीतिक, सामाजिक और व्यवस्था परिवर्तन के लिए निरंतर संघर्षरत है। उन्होंने वीआईपी कल्चर को समाप्त करने, नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने और प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने के लिए एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का आह्वान करते हुए एकजुट होकर लड़ाई लड़ने पर जोर दिया।
वक्ताओं ने कहा कि देश के आम मेहनतकश लोग विशेषकर अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियाँ, अत्यंत पिछड़े वर्ग, पसमांदा मुसलमान और महिलाएं गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। इसी समय बेरोजगारी अपने चरम पर है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन और भूमिहीनों के लिए आवासीय भूमि से जुड़े संकट लगातार गहराते जा रहे हैं। बढ़ती कीमतों, महँगाई और शुल्कों का बोझ आम जनता की कठिनाइयों को और बढ़ाएगा। अत्यंत पिछड़े वर्गों को उनके संवैधानिक रूप से निर्धारित प्रतिनिधित्व से भी वंचित किया गया है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए विशेष बजटीय उप-योजनाएँ अपर्याप्त हैं, जबकि अन्य तीन समूहों के लिए कोई समर्पित बजटीय प्रावधान नहीं है। पर्यावरणीय संकट अत्यंत गंभीर है। आर्थिक और क्षेत्रीय असमानताएँ लगातार बढ़ रही हैं। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल रहा है। श्रमिकों को आधुनिक प्रकार की बंधुआ श्रम व्यवस्था की ओर धकेला जा रहा है। माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ महिलाओं का आर्थिक शोषण जारी रखे हुए हैं।
सम्मेलन में सर्वसम्मति से पास हुए प्रस्ताव में अमेरिका इजराइल गठजोड़ द्वारा संप्रभु राष्ट्र ईरान पर किए गए अवैध और बेवजह आक्रमण की कड़ी निंदा की गई। कहा कि इसने वैश्विक अस्थिरता और जन-पीड़ा को बढ़ाया है। केंद्र सरकार से इस आक्रमण के खिलाफ स्पष्ट, स्वतंत्र और सिद्धांत आधारित रुख अपनाने तथा राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा की मांग की गईं।
सम्मेलन में रेखांकित किया गया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी ऊर्जा और उर्वरक संकट जारी रहेगा, जिससे कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, खादय संकट गहराएगा, और महंगाई, मुद्रास्फीति व बेरोजगारी में वृद्धि होगी। साथ ही संकल्प लिया गया कि देशभर में अभियान चलाकर जनता को जागरूक किया जाएगा। केंद्र सरकार की वर्तमान नीतियाँ- विशेषकर विदेश और व्यापार नीतियाँ कैसे इस संकट को बढ़ा रही हैं और देश की आर्थिक संप्रभुता को कमजोर कर रही है। रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान इस मुद्दे को अपने व्यापक आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बनाएगा, जो युद्ध, आर्थिक संकट और मजदूरों, किसानों तथा हाशिये के वर्गों के अधिकारों को जोड़ता है।
सम्मेलन को राष्ट्र उदय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबूराम पाल, नवनिर्माण कृषक संगठन उड़ीसा के संयोजक अक्षय, एआईपीएफ राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राहुल दास, राज्याधिकार पार्टी के वी.जी.आर. नारागोनी, इंडियन प्रजा कांग्रेस के दिल्ली अध्यक्ष हर मोहन सिंह मोंगिया, बहुजन द्रविड़ पार्टी के उपाध्यक्ष एडवोकेट अशोक कुमार, झारखंड नवनिर्माण दल के संयोजक विजय सिंह, रोजगार अधिकार अभियान के राजेश सचान, कांग्रेस विधि प्रकोष्ठ उत्तर प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट नितिन मिश्रा, आदिवासी वनवासी महासभा के कृपाशंकर पनिका ने भी संबोधित किया।
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