सरकारी विद्यालयों में किताबों को लेकर सरकार व सिस्टम लापरवाह!
मामले में बयान देने से बच रहे मंत्री व जिम्मेदार अफसर
अल्मोड़ा। सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था की असल तस्वीर बेहद बदरंग हैं। जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी समेत तमाम अव्यवस्थाओं के बीच नौनिहाल यहां पढ़ रहे हैं तो वजह सिर्फ उनकी मजबूरी है। जिले में सरकारी स्कूलों में अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि शिक्षा सत्र शुरू हुए पांच माह से अधिक का समय हो चुका है। लेकिन विद्यार्थियों को अब तक पाठयक्रम के मुताबिक कई किताबें नसीब नहीं हो पाई हैं। सवाल यह है कि यदि मंत्री, विधायकों और अफसरों के बच्चे भी इन सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे होते तो भी क्या सरकारी सिस्टम किताबों को लेकर इतना ही लापरवाह होता?
सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध अटल उत्कृष्ट विद्यालयों में अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं शुरू हो चुकी है। जबकि उत्तराखंड बोर्ड वाले विद्यालयों में भी जल्द परीक्षाएं शुरू होने वाली है।बिना किताब के विद्यार्थी पढेंगे कैसे और शिक्षक पढ़ाएंगे कैसे, इसकी सुध न तो सरकार को है और न ही विभागीय अफसरों को। जिसका सीधा असर अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं व बच्चों के परीक्षाफल पर पड़ना तय है।
सरकार द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क ड्रेस, किताब आदि संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। अप्रैल माह से नया शिक्षा सत्र शुरू हो जाता है। उम्मीद रहती है कि मई महीने तक स्कूलों में छात्र संख्या के मुताबिक सभी विषयों की किताबें स्कूलों के जरिए बच्चों को उपलब्ध हो जानी चाहिए। लेकिन यहां हकीकत कड़वी है।
उदाहरण के तौर पर जीआईसी डीनापानी में 12 वीं की अर्थशास्त्र, नवीं में हिंदी, जीआईसी हवालबाग में भूगोल, इतिहास भाग एक, हिंदी अंग्रेजी, गणित की एक्टिविटी बुक और कक्षा छठी की बसंत भाग एक किताब नहीं पहुंची है। चौखुटिया के जीआईसी महाकालेश्वर में छठी कक्षा की दीपकम, दसवीं में संस्कृत, इंटर में रसायन विज्ञान भाग दो किताबें नहीं पहुंचीं। यही हाल जीआईसी दन्यां, खेती, आरासल्पड़ समेत अधिकांश स्कूलों में यही हाल है। हैरानी की बात ये है कि कुछ विद्यालयों के प्रधानाचार्य इन हालातों को छिपाने की कोशिश भी करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
जिले में 157 जूनियर 263 इंटर कॉलेज और 1196 प्राथमिक विद्यालय हैं। इन स्कूलों में संसाधनों के अभाव में पहले से ही छात्र संख्या घटती जा रही है। किताब जैसी मूलभूत जरूरत भी उपलब्ध नहीं होने पर छात्र संख्या बढ़ने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। इसके लिए अभिभावक नहीं सरकार और शिक्षा विभाग का सिस्टम पूरी तरह जिम्मेदार है। स्कूलों में सभी विषयों की किताबें नहीं पहुंचना तो समस्या है ही लेकिन पाठ्यक्रम की चार से अधिक किताबों का अब तक नहीं छप पाना उससे भी बड़ी समस्या है। शिक्षा विभाग के सूत्रों के मुताबिक 6 से 8 तक की पर्यावरण विषय की पुस्तक, नौवीं और दसवीं गृह विज्ञान, संबोधनी, 11 वीं कक्षा की निर्झरा (संस्कृत) की किताबें अब तक प्रकाशित ही नहीं हुई हैं।
शिक्षा मंत्री ने दिया गोलमोल जवाब
अल्मोड़ा। प्रदेश के शिक्षा मंत्री पिछले दिनों दौरे पर अल्मोड़ा पहुंचे थे। किताबों की कमी की जानकारी उनके संज्ञान में लाई गई थी। शिक्षा मंत्री का कहना था सरकार बच्चों को निशुल्क ड्रेस, किताबें साईकिल आदि संसाधन दे रही है। बच्चों को किताब नहीं मिल पाने के सवाल पर मंत्री गोलमोल जवाब देकर पत्रकारों से बचते रहे। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो किताबों की धनराशि भी डीबीटी के माध्यम से बच्चों के खातों में भेजी जाएगी। बच्चों को सभी संसाधन निर्धारित समय पर मिलें यह जिम्मेदारी तो सरकार व शिक्षा विभाग की ही है। लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा को लेकर सरकार, मंत्री और शिक्षा विभाग के अधिकारी कितने जिम्मेदार हैं।
प्रदेश मुख्यालय से पूर्व में अल्मोड़ा में जो भी किताबें प्राप्त हुई थी, उन्हें स्कूलों में पहुंचा दिया गया था। वर्तमान में किताबों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट मांगी गई है। किताबें वितरण में कोई लापरवाही मिलने पर संबंधितों के खिलाफ कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
-अत्रेश सयाना, मुख्य शिक्षा अधिकारी, अल्मोड़ा।
राजकीय शिक्षक संघ की ओर से एक सप्ताह पहले विद्यालयों से अपने स्तर से रिपोर्ट मांगी गई थी। जिसमें 50 फीसदी से अधिक विद्यालयों में कई विषयों की पुस्तकें प्राप्त नहीं हुई है। विद्यालयों में प्रधानाचार्य के 80 फीसदी से अधिक पदों के साथ ही लिपकीय व स्वच्छक के अधिकांश पद रिक्त चल रहे हैं। सरकार व विभाग को इस मामले में गंभीर होने की जरूरत है। और प्रधानाचार्य के पदों को पदोन्नति के माध्यम से भरा जाए।
-भूपाल सिंह चिलवाल, जिलाध्यक्ष, राजकीय शिक्षक संघ अल्मोड़ा।
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