-मेडिकल बोर्ड की जांच में 36 शिक्षकों के दिव्यांग प्रमाण-पत्र मिले गलत
– 40% से कम दिव्यांगता होने पर भी कोटे से पा ली सरकारी नौकरी
देहरादून: दिव्यांगता के फर्जी प्रमाणपत्र के जरिये शिक्षा विभाग में नौकरी पाने का खुलासा हुआ है। राज्य मेडिकल बोर्ड की जांच में अब तक 36 ऐसे शिक्षक पकड़े जा चुके हैं, जिनके दिव्यांगता प्रमाण-पत्र गलत पाए गए।
हाईकोर्ट के आदेश पर शिक्षा विभाग में दिव्यांग कोटे से नियुक्त शिक्षकों और कर्मचारियों की जांच जारी है। इसके तहत राज्य मेडिकल बोर्ड अब तक 10 बैठकों में इनके प्रमाण-पत्रों का परीक्षण कर चुका है। जांच प्रक्रिया के दौरान सभी शिक्षक-कर्मचारियों के प्रमाण-पत्रों की जांच ऋषिकेश एम्स में कराई गई थी। 794 शिक्षक-कर्मचारियों को जांच के लिए चिह्नित किया गया था। 587 ही मेडिकल बोर्ड के सामने पेश हुए।
दिव्यांग है बेटा, सूची में नाम पिता का
जांच में यह भी पता चला कि दो मामलों में दिव्यांगता बेटे की थी, पर पिता का नाम संदिग्ध की सूची में डाल दिया गया। दो अभ्यर्थी ऐसे थे, जिन्होंने दिव्यांगता के आधार पर नौकरी नहीं पाई है। लेकिन उनके नाम भी दिव्यांगता की सूची में शामिल कर दिया गया। एक अफसर ने बताया, ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड बनाम उत्तराखंड’ केस में हाईकोर्ट ने दिव्यांग प्रमाणपत्र की जांच के आदेश दिए थे।
पुराने प्रमाण-पत्र ले आए
कुछ शिक्षक ऐसे मिले, जिनके दिव्यांग प्रमाणपत्र की वैधता 2020 में समाप्त हो चुकी थी, वे पुराने प्रमाणपत्र के साथ पहुंच गए। चमोली के एक शिक्षक का अस्थि विकार से जुड़ा प्रमाण 1995 का मिला। मेडिकल बोर्ड ने अब नया प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने को कहा है।
मानक 40, सर्टिफिकेट में 30% दिव्यांगता दर्ज
कुछ शिक्षकों के प्रमाणपत्र तो सही पाए गए, लेकिन उनकी दिव्यांगता का प्रतिशत केवल 30 प्रतिशत निकला। जबकि सरकारी नौकरी में दिव्यांग कोटे का लाभ लेने के लिए न्यूनतम 40 प्रतिशत दिव्यांगता अनिवार्य है।
“जांच से छूटे शिक्षकों को एक और अवसर दिया जा रहा है। ऐसे सभी शिक्षकों की 11 मई को दोबारा एम्स में जांच कराई जाएगी। सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों को ऐसे शिक्षकों को जल्द सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं।”
-परमेंद्र कुमार बिष्ट, अपर निदेशक माध्यमिक
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