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छात्र संघ चुनाव 2022: राजनीति की नर्सरी में सियासतदानों का दखल… क्या कहते हैं पूर्व छात्र नेता, शिक्षक व छात्र

अल्मोड़ा: राजनीति की पहली सीढ़ी माने जाने वाले छात्र संघ चुनाव में राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप लगातार बढ़ते जा रहा है। छात्रसंघ चुनाव में राजनीतिक दलों की पैठ न सिर्फ छात्र संघ के भविष्य के लिए खतरा बन रही है बल्कि इससे छात्र राजनीति का स्वरूप भी बदल रहा है। छात्र संघ चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा के रूप में देखने वाले राजनीतिक दल भले ही प्रत्यक्ष रूप से चुनावी मैदान में न हो, लेकिन उनके द्वारा अपने समर्थित प्रत्याशी को पूरा बैकअप दिया जा रहा है।

अल्मोड़ा का एसएसजे परिसर इन दिनों पूरी तरह चुनावी रंग में रंगा है। कैंपस के अधिकांश छात्र संगठन सीधे तौर पर या अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं। चुनावी दंगल में कूदे कुछ प्रत्याशी पूर्व छात्र संघ पदाधिकारियों से आर्शीवाद लेने पहुंच रहे है तो कुछ राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के चक्कर लगा रहे है। राजनीतिक दलों के नेता भी चुनावी माहौल को पार्टीगत रंग देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है।

छात्र संगठनों के इस हद तक राजनीतिकरण को पूर्व छात्र नेताओं ने गलत ठहराया है। उनका कहना है कि छात्र राजनीति में राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप न के बराबर होना चाहिए ताकि एक छात्र नेता अपने विचार व छात्र हितों को लेकर चुनाव लड़ सके।

सोबन सिंह जीना परिसर के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष रहे भूपेंद्र भोज ‘गुड्डू’ ने कहा कि वर्तमान में छात्र राजनीति राजनीतिक दलों के इर्द गिर्द घूम रही है। जिस कारण छात्र राजनीति से अच्छे नेता उभर कर नहीं आ पा रहे हैं। ​इसलिए छात्र चुनाव में राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप कम होना चाहिए।

भूपेंद्र भोज

भूपेंद्र भोज ने कहा कि पूर्व की छात्र राजनीति व आज की छात्र राजनीति में काफी अंतर आ चुका है। आज चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी अपने दम पर नहीं बल्कि किसी पार्टी के समर्थन व उसके विचार के आधार पर छात्र राजनीति में कूद रहा है। प्रत्याशी को न कॉलेज से संबंधित जानकारी होती है न वह छात्र राजनीति के बारे में कुछ सीख पाता है। जिसके चलते मौजूदा दौर में एक नये नेतृत्व की कमी साफ तौर पर देखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि लिंगदोह की सिफारिशें लागू होने के बाद से भी छात्र राजनीति कमजोर हुई है।

एसएसजे कैंपस के पूर्व छात्र संघ महासचिव रहे विनीत बिष्ट ने कहा कि छात्र आंदोलनों का एक अपना दौर रहा है चाहे वह आपातकाल का दौर हो या फिर उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर चला आंदोलन। छात्रों ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई थी। उन्होंने कहा कि छात्र शक्ति राष्ट्र शक्ति मानी जाती है इसलिए छात्र राजनीति में राजनीतिक दलों को दखल न देकर उन्हें अपने खुद के विचार व मुद्दों से चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। तब जाकर भविष्य में देश में एक अच्छे नेतृत्व का उदय हो पाएगा।

विनीत बिष्ट

विनीत बिष्ट ने कहा कि वर्तमान में हालात ​ठीक इसके उलट नजर आ रहे है। अब राजनीतिक दलों के लोग युवाओं व छात्रों को सिर्फ अपने प्रोपेगेंडा को सिद्ध करने के लिए उपयोग में लाते है। जिससे देश व छात्र दोनों का भविष्य खराब हो रहा है। विनीत कहते है कि लिंगदोह ​समिति लागू होने के बाद से छात्र राजनीति कमजोर हुई है और राजनीतिक दलों के लोग मजबूत हुए है।

प्रो. इला साह

एसएसजे परिसर की सीनियर प्रोफेसर व वर्तमान में अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. इला साह ने कहा कि वह करीब चार दशक से एसएसजे परिसर में अपनी सेवाएं दे रही है और हमेशा से यह माहौल यहां पर देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं इसे उचित नहीं मानती है। छात्र राजनीति को छात्र राजनीति तक सीमित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों के दखल से न सिर्फ छात्र राजनीति प्रभावित हो रही है ​बल्कि जिन छात्रों का राजनीतिक हस्तक्षेप कहीं पर नहीं होता ऐसे छात्रों में निराशा होती है।

छात्र संघ चुनाव में राजनीतिक दलों के बढ़ते दखल से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी व ऐसे उम्मीदवार जो अपने बलबूते चुनाव में खड़े है, वह इससे आशंकित हैं। प्रत्याशियों का आरोप है कि एसएसजे कैंपस में प्रोफेसरों के एक ग्रुप द्वारा लंबे समय से किसी संगठन विशेष को सपोर्ट किया जाता है और जिन प्रत्याशियों पर कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है उन्हें कई तरह से दबाने का प्रयास होते है।

वही, एसएसजे परिसर के छात्र निखिल, विवेक कहते है कि एसएसजे कैंपस में पिछले कुछ सालों से मुख्य राजनीतिक दलों के अनुषांगिक संगठनों का वर्चस्व है। अधिकांश छात्र-छात्राएं भी अकसर इन्ही संगठनों के प्रत्याशियों का समर्थन करते है। छात्रों का कहना है कि अब छात्र राजनीति धनबल व बाहुबल पर केंद्रित हो चुकी है।

छात्र राजनीति के तेजी से हो रहे राजनीतिकरण के बारे में पूछने पर जहां कुछ लोगों ने खुल कर अपने विचार रखें वही, एसएसजे कैंपस के कई शिक्षक इस पर बयान देने से बचते नजर आए। कई शिक्षकों ने नाम न लिखने की शर्त पर ​अपना पक्ष रखने की बात कही।

 

 

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