-एनएमएचएस में एक दशक से सेवाएं दे रहे परियोजना कर्मचारियों ने पुनर्गठन प्रक्रिया पर उठाए सवाल
-कर्मचारियों ने कहा, शोध अनुसंधान के नाम पर हिमालयी समाज के साथ हो रहा है छलावा
अल्मोड़ा: गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी-कटारमल की कार्यप्रणाली और हाल ही में राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन (एनएमएचएस) के पुनर्गठन को लेकर जारी विज्ञप्ति प्रक्रिया पर विवाद खड़ा हो गया है। एनएमएचएस परियोजना कर्मचारियों ने भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता, अनुभव और योग्यता की अनदेखी तथा पुराने कर्मचारियों को बिना आधार के बाहर किए जाने समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं। कर्मचारियों ने पूरे मामले की स्वतंत्र व उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
प्रेस क्लब में मंगलवार को एनएमएचएस पीएमयू में कार्यरत डाॅ पुष्कर सिंह, आईसीटी हैड अरविंद कुमार और प्रोजेक्ट एसिस्टेंट आईटी गौरव कुमार ने संयुक्त रूप से प्रेस वार्ता कर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि करीब एक माह पूर्व एनएमएचएस की ओर से पुनर्गठन को लेकर विज्ञप्ति जारी की गई थी। उन्होंने विज्ञप्ति में निर्धारित कुछ योग्यताओं को अव्यावहारिक बताते हुए इसका विरोध किया और कई जनप्रतिनिधियों को भी मामले से अवगत कराया। मंत्रालय की संयुक्त सचिव नमिता प्रसाद के समक्ष निदेशक की मौजूदगी में उन्हें सकारात्मक आश्वासन मिला था। पूर्व के सभी पदों को समाप्त कर सिर्फ दो पदों के विकल्प बनाए गए। 17 पदों के लिए ऑनलाइन साक्षात्कार आयोजित किए गए। आरोप है कि इसी दौरान परियोजना से जुड़े कर्मचारियों को बिना स्पष्ट कारण नोटिस देकर बाहर कर दिया गया।
डाॅ पुष्कर ने कहा कि वे एनएमएचएस जैसे राष्ट्रीय मिशन में एक दशक से काम कर रहे हैं। इस अवधि में उन्होंने मानदेय बढ़ाने या स्थायीकरण जैसी मांग नहीं उठाई। उन्होंने कहा कि साल 2024 से एनएमएचएस के पुनर्गठन की चर्चाएं थी लेकिन कभी आधिकारिक तौर पर उन्हें सूचित नहीं किया गया। अनेक नए पद भी भरे जाने थे। 11 हिमालयी राज्यों की 200 से अधिक परियोजनाओं के काम को लगभग 11 कर्मचारी देख रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2024 के बाद मिशन के संचालन में अनुभवहीन नेतृत्व के कारण इसकी कार्यप्रणाली प्रभावित हुई।
कर्मचारियों ने कहा कि बीते दिनों आए परिणामों में अनेक अनुभवहीन और अयोग्य पात्रों के चयन ने सभी को आहत किया है। इससे पूर्व एक परियोजना स्टाफ न्यायालय में जाकर स्वयं के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं। उन्होंने परियोजना स्टाफ भर्ती में डीओपीटी नियमों का पालन नहीं किए जाने और गैर हिमालयी राज्यों से अनुभवहीन लोगों से मिशन में नियुक्ति देने के आरोप लगाए है।
उन्होंने नोडल अधिकारी एमएस लोधी सहित संस्थान के निदेशक आईडी भट्ट पर लापरवाही करने और जानबूझ कर स्वजनों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से यह कुचक्र रचने का आरोप लगाया और कहा कि जिस मानदेय में वे काम कर रहे थे उसी काम के लिए चार गुने नए परियोजना स्टाफ को दिया जा रहा है। जबकि पुराने कर्मचारियों की नियुक्ति भी विज्ञप्ति और साक्षात्कार के माध्यम से योग्यता के आधार पर हुई थी। उन्होंने कहा कि दो प्रभावित कर्मचारियों ने इस मामले में अनुसूचित आयोग से शिकायत की है और न्यायालय में भी लंबी लड़ाई लड़ने की चेतावनी दी है।
कर्मचारियों ने संस्थान में शोध और परियोजनाओं के संचालन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। कहा कि संस्थान के अनुभवहीन कुछ वैज्ञानिक शोध के नाम पर बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त है और मंत्रालय के अधिकारी संभवतः केंद्रीय मंत्री को भी धोखा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ी तो वे एक दशक में उनके सामने विज्ञान और अनुसंधान के नाम पर हो रहे सभी छलावों की पोल खोलेंगे और हिमालयी राज्यों के आकड़ों सहित संस्थान ने जनता के पैसे के साथ कितना न्याय किया इसका भंडाफोड़ करेंगे। परियोजनाओं के पैसे की बंदरबांट, अयोग्ता को योग्यता साबित करने, वर्षों से अपने अनुसंधान क्षेत्रों में न जाकर लाखों का वेतनमान डकारने वाले वैज्ञानिकों की पोल खोलने के साथ ही केंद्रीय जांच एजेंसियों तक संस्थान के गंभीर भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करेंगें।
प्रभावित कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि संस्थान किसी परमाणु कार्यक्रम या रक्षा अनुसंधान पर काम नहीं करता है फिर भी कर्मचारियों को नियुक्ति से पूर्व ब्रिटिशकालीन आफिसियल एक्ट के नाम से बॉन्ड भरवाकर नियुक्ति दी जा रही है और अक्सर मीडिया को अपने अनुसंधान कार्यक्रमों से दूर रखा जाता है। कहा कि यदि मंत्रालय में कुछ लोगों की मिलीभगत नहीं है तो तत्काल इस विज्ञप्ति को निरस्त कर पादर्शिता से एनएमएचएस का संचालन किया जाए और योग्य व्यक्ति को एनएमएचएस नोडल बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि गोविंद बल्लभ पंत की विरासत से जुड़े संस्थान की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। लेकिन संस्थान का वर्तमान नेतृत्व इस विरासत को समाप्त करने पर लगा है। उन्होंने कहा कि समाज को आगाह करने की दृष्टि से उन्होंने यह कदम उठाया है। स्वतंत्र जाॅच एजेंसी से इस मामले की जांच कराकर उनके आरोपों को पुष्ट किया जा सकता है। उन्होंने बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों और वैज्ञानिक समुदाय से भी संस्थान की कार्यप्रणाली का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने की अपील की।
उधर, संस्थान के निदेशक डॉ. आईडी भट्ट ने बाहर किए गए परियोजना कर्मचारियों की ओर से लगाए गए आरोपों को आधारहीन बताया है। उन्होंने कहा कि मामले को देखा जा रहा है। प्रकरण की पूरी जानकारी और तथ्यों की समीक्षा के बाद ही इस संबंध में विस्तार से कुछ कहा जा सकता है।
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