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पर्यावरण संस्थान से हटाए गए कर्मचारियों ने अब संस्थान के दावों पर उठाए सवाल, कर्मचारियों ने मांगा उपलब्धियों का जमीनी हिसाब

कर्मचारियों ने कहा, परियोजनाओं का बजट, परिणाम और फील्ड रिपोर्ट सार्वजनिक करे संस्थान

अल्मोड़ा: जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान (GBPNIHE) के राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन (एनएमएचएस) के पुनर्गठन और परियोजना कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब संस्थान की वर्षों की शोध एवं परियोजना उपलब्धियों तक पहुंच गया है। इस मामले में संस्थान की ओर से जारी बयान के बाद हटाए गए परियोजना कर्मचारियों ने संस्थान के विभिन्न दावों पर सवाल उठाये हैं।

प्रेस को जारी बयान में प्रभावित कर्मचारी डॉ पुष्कर सिंह व अन्य ने कहा कि संस्थान केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने के बजाय प्रत्येक परियोजना का बजट, उद्देश्य, फील्ड कार्य, परिणाम और उससे लाभान्वित लोगों का विवरण सार्वजनिक करे।

उन्होंने कहा कि अपनी सफाई में संस्थान ने 35 वर्षों की उपलब्धियों का उल्लेख किया है, लेकिन अब आवश्यकता इन उपलब्धियों के जमीनी सत्यापन की है। उन्होंने दावा किया कि शोधार्थियों और फील्ड कर्मचारियों के माध्यम से आंकड़े और तस्वीरें जुटा लेना अपने आप में वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय केंद्रों में कुछ वैज्ञानिक अपने कार्यों को लेकर गंभीरता से काम कर रहे हैं, लेकिन संस्थान के दावों का स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है।

 

कर्मचारियों ने संस्थान के जैव विविधता संरक्षण संबंधी दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि संस्थान जैव विविधता संरक्षण, जैव विविधता प्रबंधन समितियों और लाभ साझाकरण से संबंधित अपने कार्यों के प्रमाण सार्वजनिक करे। उन्होंने विशेष रूप से करीब 500 जैव विविधता प्रबंधन समितियों के गठन से जुड़े दावों का जिक्र करते हुए कहा कि इन समितियों की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। कहा कि राज्य जैव विविधता बोर्ड के साथ मिलकर इनमें से कम से कम 10 समितियों का स्थलीय निरीक्षण कराया जाए, ताकि दावों और जमीन पर वास्तविक स्थिति की तुलना हो सके। साथ ही जैव विविधता रजिस्टरों की अद्यतन स्थिति, समितियों के गठन के लिए प्राप्त धनराशि और परियोजनाओं पर हुए खर्च का विवरण भी सार्वजनिक करने की मांग की।

 

बयान में कर्मचारियों ने जड़ी-बूटी आधारित परियोजनाओं को लेकर भी संस्थान से विस्तृत जानकारी मांगी। उनका कहना है कि इन परियोजनाओं में खर्च हुई धनराशि, परियोजना स्थल, निर्धारित उद्देश्य और प्राप्त परिणामों का विवरण मीडिया और जनता के सामने रखा जाना चाहिए। केवल परियोजना के नाम या तकनीकी शब्दावली के आधार पर उपलब्धियों का आकलन नहीं किया जा सकता।

उत्तराखंड में जल संरक्षण और जल अभयारण्य की अवधारणा से जुड़े संस्थान के दावों पर भी कर्मचारियों सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि इस क्षेत्र में कितनी धनराशि प्राप्त हुई, किन स्थानों पर कितने जल स्रोतों का उपचार किया गया और इन कार्यों के क्या परिणाम रहे।

 

कर्मचारियों ने अपने बयान में कहा कि वर्ष 2020 में चंपावत से इस अवधारणा के औपचारिक रूप से शुरू होने की बात सामने आती है। उनका दावा है कि निर्धारित गांवों में जाकर कार्यों का स्थलीय सत्यापन किया जा सकता है। उन्होंने स्वजल और जल संस्थान के आंकड़ों के साथ भी इन दावों की तुलना किए जाने की मांग की।

18 हजार या उससे अधिक जल स्रोतों की जियो-टैगिंग को लेकर भी कर्मचारियों ने सवाल उठाए। उनका कहना है कि जियो-टैगिंग अपने आप में वैज्ञानिक अनुसंधान का प्रमाण नहीं है और इस तरह का काम अन्य सरकारी विभाग भी करते रहे हैं।

 

कर्मचारियों ने ग्लेशियरों से संबंधित संस्थान की गतिविधियों पर भी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने पूछा कि संस्थान वर्तमान में कितने ग्लेशियरों पर काम कर रहा है, इस कार्य पर कितनी धनराशि खर्च हुई, वैज्ञानिकों ने कितने दिन संबंधित क्षेत्रों में फील्ड विजिट की और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थापित वेदर स्टेशनों की वर्तमान स्थिति क्या है। उन्होंने कहा कि संस्थान यह भी स्पष्ट करे कि उत्तराखंड अथवा अन्य हिमालयी राज्यों में किन ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों का अध्ययन किया जा रहा है तथा संबंधित निष्कर्षों को केंद्र सरकार के समक्ष कब और किस रूप में रखा गया।

कर्मचारियों ने पर्वतीय जोखिम इंजीनियरिंग, बादल फटने, भूस्खलन और ठोस कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में संस्थान की उपलब्धियों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि संस्थान इन क्षेत्रों में संचालित परियोजनाओं के नाम बताने के साथ यह भी सार्वजनिक करे कि उनके शोध का वास्तविक उपयोग किस हिमालयी राज्य और किस क्षेत्र में हुआ। उन्होंने संस्थान द्वारा बताई जा रही तकनीकों में से नई और पूर्व में उपलब्ध तकनीकों का अंतर भी स्पष्ट करने की मांग की।

 

कर्मचारियों ने सोलर हीट आधारित भवनों के अध्ययन को लेकर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि इस दिशा में हिमाचल प्रदेश में पहले ही काम हो चुका था। उन्होंने आरोप लगाया कि एनएमएचएस के स्तर पर इस कार्य को दोहराने में करोड़ों रुपये खर्च हुए। कर्मचारियों ने कहा की कि संस्थान संबंधित परियोजना के तहत किए गए फील्ड कार्य, वैज्ञानिकों की यात्राओं, खर्च और अब तक प्राप्त परिणामों का पूरा विवरण सार्वजनिक करे।

कर्मचारियों ने संस्थान के पौधरोपण और पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन से जुड़े दावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने मांग की कि मीडिया को ऐसे स्थलों का निरीक्षण कराया जाए जहां पिछले पांच वर्षों में पौधरोपण अथवा पुनर्स्थापन का काम किया गया है और यह बताया जाए कि वहां कितनी नई प्रजातियां लगाई गईं तथा प्राकृतिक पुनर्जनन के अलावा संस्थान ने क्या नया कार्य किया। वही, मिशन लाइफ से जुड़े कार्यों और विभिन्न जिलों के लिए तैयार किए गए एक्शन प्लान का विवरण भी सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

 

अपने बयान में कर्मचारियों ने हिमालयी नॉलेज नेटवर्क से जुड़े दावों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों और संबंधित संस्थानों से बातचीत के आधार पर नेटवर्क की वास्तविक उपयोगिता का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संस्थान को यह बताना चाहिए कि विभिन्न शोध संस्थानों के साथ बैठकों के अलावा कितने फील्ड साइटों पर उसके वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से काम किया और कितने दिन फील्ड में बिताए। कहा कि हिमालयी समाज के हित में प्रकाशित शोध पत्रों, लेखों और अन्य प्रकाशनों का विवरण सार्वजनिक किया जाए और बताया जाए कि ये प्रकाशन संबंधित हितधारकों तक किस तरह पहुंचे तथा उनसे उन्हें क्या लाभ मिला।

 

कर्मचारियों ने संस्थान से प्रत्येक परियोजना का बजट, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, फील्ड गतिविधियां और अंतिम परिणाम सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका आरोप है कि संस्थान की मौजूदा उपलब्धियों में पूर्व निदेशकों और पूर्व में काम कर चुके वैज्ञानिकों के कार्यों का योगदान भी शामिल है, जिसका वर्तमान नेतृत्व श्रेय ले रहा है।

एनएमएचएस के पुनर्गठन को लेकर कर्मचारियों ने संस्थान से पूछा कि हटाए गए अथवा वर्तमान में कार्यरत परियोजना कर्मचारियों को संशोधित NMHS Guidelines, 2025 कब उपलब्ध कराई गईं। यह सवाल संस्थान के उस बयान के बाद उठाया गया है जिसमें उसने कहा था कि PMU का पुनर्गठन संशोधित NMHS Guidelines, 2025 के अनुरूप किया गया है और संबंधित कर्मचारियों को 20 जुलाई 2026 को पत्र जारी किया गया था। कर्मचारियों का कहना है कि यदि पुनर्गठन की प्रक्रिया पहले से तय थी तो संबंधित गाइडलाइन कर्मचारियों को उपलब्ध कराए जाने का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

 

कर्मचारियों ने संस्थान में करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित 3डी सेंटर, सीडीएमएस, प्रयोगशालाओं, उपकरणों और विभिन्न परियोजना साइटों का मीडिया तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों से स्थलीय निरीक्षण कराने की मांग की है। उनका कहना है कि संस्थान को कागजी दावों के बजाय इन सुविधाओं और परियोजनाओं के वास्तविक परिणाम दिखाने चाहिए।

 

हटाए गए कर्मचारियों ने बयान में कहा कि यदि संस्थान की ओर से भर्ती प्रक्रिया में किसी प्रकार का पक्षपात या षड्यंत्र नहीं हुआ है तो पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वे संस्थान की परियोजनाओं और कार्यों का सामाजिक दायित्व के तहत आगे भी स्वतंत्र रूप से अध्ययन और निगरानी करने का प्रयास करेंगे। दानदाता, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और केंद्र सरकार के विभिन्न मंचों के साथ अंतराष्ट्रीय पटल पर भी निरंतर संस्थान के झूठे दावों को बेनकाब करेंगे। उन्होंने कहा कि इसमें उन परियोजना माफियाओं को बेनकाब करना उनका मुख्य उद्देश्य होगा, जो करोड़ों की परियोजनाएं हथियाकर जनता के साथ छलावा कर रहे हैं।

 

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