अल्मोड़ा: उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और राज्य आंदोलनकारी रहे जननायक डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट की आठवीं पुण्यतिथि पर ‘अनियंत्रित विकास से घायल हिमालय’ विषय पर विस्तृत परिचर्चा आयोजित की गई। इस दौरान स्व. बिष्ट के पर्यावरण संरक्षण और उत्तराखंड के जन आंदोलनों में उनके योगदान को याद किया गया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते अनियंत्रित पर्यटन, पर्यावरणीय संकट और नदी घाटियों में हो रहे बेतरतीब निर्माण पर चिंता जताते हुए सरकारों की जवाबदेही तय करने की जरूरत बताई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, गांधीवादी विचारक और पर्यावरणविद् कुमार कलानन्द मणि ने कहा कि डा. शमशेर सिंह बिष्ट को चिपको आंदोलन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के आंदोलन को आगे बढ़ाने और मद्यपान जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संघर्ष के लिए याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस ऑक्सीजन को कभी प्रकृति मुफ्त में उपलब्ध कराती थी, आज उसी के लिए ऑक्सीजन पार्लर खुलने लगे हैं। यह आधुनिक विकास की दिशा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद ग्रामीण भारत के प्रति उपेक्षा की नीति अपनाई गई और यूरोप के विकास मॉडल को आदर्श मान लिया गया। इसका परिणाम यह है कि दुनिया के कई शहर रहने योग्य नहीं रह गए हैं और भारत के अनेक विकसित शहरों में वायु गुणवत्ता चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुकी है। उन्होंने बोतलबंद पानी को नैनो प्लास्टिक का एक स्रोत बताते हुए कहा कि आज हवा और पानी के साथ अनाज की शुद्धता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
कुमार कलानन्द मणि ने गांधी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी ने वर्ष 1909 में ही आधुनिक सभ्यता और विकास की दिशा को लेकर चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा कि आज गोवा जैसे स्थानों पर वायु प्रदूषण से बचने के लिए एयर फिल्टर की जरूरत महसूस की जा रही है और आने वाले समय में ऑक्सीजन फिल्टर भी लोगों की आवश्यकता बन सकते हैं।
उन्होंने उत्तराखंड के गठन के बाद विकास की दिशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अनियंत्रित पर्यटन ने प्रदेश के कई पर्यटक नगरों पर दबाव बढ़ाया है। पहाड़ों में बाहरी लोगों के बड़े-बड़े भवन और बंगले बन रहे हैं, जबकि स्थानीय लोगों की समस्याएं जस की तस हैं। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में पर्यावरण और संसाधनों से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं।
दयाकृष्ण काण्डपाल ने कहा कि हिमालयी पर्वतीय भू-भाग में राजनीतिक-सामाजिक एकता और जन मुद्दों को लेकर डा. शमशेर सिंह बिष्ट और उनके साथियों का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने कहा कि शमशेर बिष्ट ने पहाड़ के सवालों को व्यापक स्तर पर उठाने का काम किया।
हिमालयी वैज्ञानिक डा. महेन्द्र सिंह मिराल ने स्लाइड शो के माध्यम से हिमालय की वर्तमान परिस्थितियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, जिससे हिमालय में बड़ी झीलों के बनने और भूगर्भीय हलचलों जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। उन्होंने नदी घाटियों में तेजी से बसाए जा रहे नगरों को भविष्य के गंभीर खतरों का संकेत बताया।
उपपा नेता पीसी तिवारी ने शमशेर सिंह बिष्ट के साथ अपने संघर्षों को याद करते हुए कहा कि सवालों के समाधान के लिए बोलना और उसके लिए संघर्ष करना जरूरी है। उन्होंने हिमालय से जुड़ी समस्याओं के लिए सरकारों की जवाबदेही तय करने की मांग उठाई।
डा. निर्मल जोशी ने नैनीताल में हो रहे भू-धंसाव पर चिंता जताई। एडवोकेट जगत रौतेला ने उत्तराखंड के जन संघर्षों में शमशेर बिष्ट की भूमिका को याद किया। पूर्व पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने कहा कि शमशेर सिंह बिष्ट पहाड़ की जनसमस्याओं को लेकर हमेशा संघर्षरत रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ और समापन जनगीतों के साथ हुआ।
इस दौरान डॉ शमशेर सिंह बिष्ट के पुत्र अजयमित्र सिंह बिष्ट ने मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ताओं का जीवन परिचय दिया। अजयमित्र सिंह बिष्ट, बिशन दत्त जोशी, जंगबहादुर थापा और डा. वसुधा पंत ने गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली के रमेश शर्मा, कुमार कलानन्द मणि और डा. महेन्द्र सिंह मिराल को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। रेवती बिष्ट ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम में ब्रह्मानंद डालाकोटी, डा. जेसी दुर्गापाल, डा. निर्मल जोशी, आनंद सिंह बगड़वाल, मोहम्मद हारिस, शिवदत्त पांडे, राम सिंह, बसंत खनी, डा. हयात रावत, डा. देव सिंह पोखरिया, महेश परिहार, शेखर लखचौरा, कवीन्द्र पंत, भावना जोशी, विनय किरौला, आशीष जोशी, संजय पांडे सहित अनेक लोग मौजूद रहे।
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