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लमगड़ा मारपीट मामला: कफल्टा कांड दोहराने की धमकी देने समेत लगाए कई गंभीर आरोप, भीम आर्मी ने दिया 10 दिन का अल्टीमेटम

अल्मोड़ा: लमगड़ा थाना क्षेत्र में दलित समुदाय के बारातियों से हुई मारपीट मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने से नाराज भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने पीड़ित लोगों के साथ पुलिस उपाधीक्षक विमल प्रसाद से उनके कार्यालय में मुलाकात की। जहां उन्होंने बताया कि घटना के दिन हमलावरों द्वारा बारातियों को कफल्टा कांड दोहराने, मंदिर को अपवित्र करने, महिलाओं के साथ छेड़खानी करने व घर में घुसकर गोली मारने की धमकी दी गई। भीम आर्मी ने 10 दिन के भीतर आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

 

 

भीम आर्मी के कुमाउं मंडल संयोजक गोविंद बौद्ध के नेतृत्व में कई कार्यकर्ता व पीड़ित बुधवार को सीओ से मिलने उनके कार्यालय पहुंचे। जहां उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ लोगों द्वारा षड़यंत्र के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया। कुछ बाराती गांव के मंदिर में गये हुए थे। शाम को बारात जब वापस लौट रही थी, गांव की सड़क में कुछ लोगों ने बारात को रोककर मंदिर को अपवित्र किए जाने की बात कहते हुए बारातियों पर लाठी—डंडों से हमला करना शुरू कर दिया। बारातियों को कफल्टा कांड को दोहराने व घर में घुसकर गोली मारने जैसी धमकियां दी गई। साथ ही उनकी महिला बारातियों के साथ छेड़खानी भी की गई।

पुलिस की जांच से संतुष्ट नहीं

भीम आर्मी के कुमाउं मंडल संयोजक गोविंद बौद्ध ने आरोप लगाते हुए कहा कि घटना के दिन बारातियों द्वारा पुलिस को सूचना दी गई। लेकिन पुलिस का कोई भी कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा। 7 मई की शाम को ही पुलिस को तहरीर सौंपी गई। लेकिन पुलिस ने उस पर कोई कार्यवाही नहीं की। जिसके बाद पीड़ित द्वारा पुलिस को कॉल की गई तो 5 दिन बाद पुलिस ने मामले में मुकदमा दर्ज किया। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा अब तक की गई जांच से वो लोग संतुष्ट नहीं है। पुलिस द्वारा उन्हें मामले में उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। उन्होंने कहा कि 10 दिन के भीतर पुलिस द्वारा आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की जाती तो भीम आर्मी बड़ा आंदोलन करेगी।

पीड़ित ने क्या कहा?

सल्ला, कपड़खान निवासी वादी ललित कुमार ने कहा कि 7 मई की शाम करीब 7 बजे जब बारात वापस लौट रही थी तो कुछ असामाजिक तत्वों ने उन पर हमला बोल दिया। हमले के दौरान उनके कपड़े फाड़े गए और उनके अन्य साथियों से भी मारपीट की गई। बारात का माहौल होने के चलते उन्होंने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की और किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागकर वह थाना पहुंचे। उन्होंने कहा कि घटना हुए एक सप्ताह का समय बीत चुका है। लेकिन अब तक हमलवार खुलेआम घूम रहे हैं। जिस तरह से हमलावरों द्वारा उन्हें व उनके साथियों को घर में घुसकर गोली मारने की धमकी दी गई है, उससे वह लोग बुरी तरह डरे सहमे हुए हैं। उन्होंने पुलिस से जल्द से जल्द आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग की है।

दूल्हा-दुल्हन को सुरक्षा देने की मांग

भीम आर्मी के कुमाउं मंडल संयोजक गोविंद बौद्ध ने कहा कि घटना के बाद दूल्हा-दुल्हन को खतरा हो सकता है।  उन्होंने पुलिस से सुरक्षा दिए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जब भी दूल्हा-दुल्हन बघाड़ गांव जाए तो उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए। कहा कि जल्द ही इस मामले में पुलिस को पत्र सौंपा जाएगा।

पुलिस ने क्या कहा?

मामले की विवेचना कर रहे सीओ विमल प्रसाद ने कहा कि मामला सामने आने के बाद पुलिस इसकी तफ्तीश में जुटी है। मामले की निष्पक्ष व हर एंगल से जांच की जा रही है। वही, पीड़ित पक्ष के आरोपों के सवाल पर सीओ ने कहा कि मामले की जांच चल रही है, जांच आगे बढ़ने के साथ ही सभी बातें साफ हो जाएंगी।

 

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ये हैं मामला

बीते 7 मई को ग्राम सल्ला, कपड़खान निवासी कमलेश पुत्र सुंदर लाल की बारात लमगड़ा थाने से करीब 13 किमी की दूरी पर स्थित बघाड़ गांव गई थी। बारात के वापस लौटते समय शाम करीब 7 बजे गांव की सड़क में कुछ असामाजिक तत्वों ने बारातियों का रास्ता रोक कर उन्हें घेर लिया और लाठी-डंडों से उनके साथ मारपीट की। किसी तरह बाराती अपनी जान बचाकर वहां से भागे। इस मामले में घटना की देर शाम को ही दूल्हे के चाचा ललित कुमार ने लमगड़ा थाने में तहरीर सौंपी। शिकायत के बाद पुलिस ने 12 मई को अज्ञात के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट व अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

क्या था कफल्टा कांड?

9 मई 1980 की तारीख उस समय उत्तराखण्ड के इतिहास की सबसे काली तारीख में से एक बनकर रह गई थी, जब अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र के कफल्टा नाम के एक छोटे से गाँव में जातीय दंभ के चलते पड़ोस के बिरलगाँव के 14 दलितों की नृशंस हत्या कर डाली गई थी। संचार के माध्यमों की हालत उन दिनों यह थी कि इतनी बड़े हत्याकांड का अगले दिन तक जिला प्रशासन व राज्य सरकार को भी पता नहीं चल पाया था। एक दलित जो किसी तरह बच के रामनगर पहुंचा। रामनगर से वह दिल्ली में को रवाना हुआ। दिल्ली में पूरी घटना का विवरण केंद्र सरकार तक जैसे-तैसे पहुंचाया। तो उसके बाद दिल्ली से अल्मोड़ा के तत्कालीन जिलाधिकारी सुरजीत किशोर दास को जो फोन आया, वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव आरके धवन का था।

इसके बाद देश भर का मीडिया यहां इकठ्ठा होने लगा था। दिल्ली से तत्कालीन गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह को भी मौके पर पहुंचना पड़ा था। तीसरे दिन जब तक डीएम गाँव पहुंचे तब तक सारे शव सड़ांध छोड़ रहे थे। सवर्ण शवों को छूने को भी राजी नहीं थे। दलित गाँव छोड़ के भाग गए थे। ऐसे शर्मनाक और वीभत्स हत्याकांड के 17 साल बाद आरोपियों (16) को अदालत से सजा हुई। तब तक 3 आरोपियों की मौत हो चुकी थीं। हालांकि इस घटना को 44 साल हो चुके हैं। लेकिन उत्तराखंड के दलित इस घटना को याद करके आज भी सिहर उठते हैं।

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